Saturday, July 10, 2010

लव इज नथिंग

दिनेश गौतम, 9829422667
क्या प्यार वाकई में अंधा होता है या खुद के स्वार्थ को हम लेाग प्यार का नाम देते है। जिस समाज और परिवार में मैंने जन्म लिया वहां प्यार का मतलब दो अजनबियों का एक दूसरे के प्रति शारीरिक आर्कषण तो कतई नहीं था। दादाजी का गुस्सा भी हमें तो प्यार नजर आता था, ये अलग बात है कि उनके ज्यादा टोकने पर हम झुंझला जाते थे। मां की डांट और पापा से डर भी अब उनके प्यार का अहसास करवाता है। ज्यादातर पापा के बडे भाई के नजदीक रहा जो पुलिस में थे, उनका बोलना ही लोगों की पेंट गीली करने के लिए काफी था। लेकिन पता नहीं क्यों कभी मैं उनसे डरा नहीं। उनका ही असर है कि आवाज में मेरे भी वो कर्कशपन है। ये आवाज लोगों को भले ही पसंद नहीं आती, पर मुझे ऐसा लगता है कि लोगों को खुश करने के लिए नेचुरल चीज को खो दूंगा।

बात प्यार की चल रही थी और अपने आपको प्रदर्शन के लिए खड़ा कर दिया। इन दिनों जिस मीडिया लाइन मेें काम कर रहा हूं। वो सीधा पब्लिक से जुड़ा हुआ है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ इस पेशे में में ही पब्लिक से जुड़ा हूं, लेकिन नए कांसेप्ट पर हमारे मोबाइल नंबर सार्वजनिक हो रहे है जिससे कई तरह के फोन आते है। कई वेवजह तो कई अपनों से परेशान। कोई अपनी गलती को छुपाकर हमें सामने वाले के लिए फर्जी सबूत तक ला देता है। इसमें निर्णय करना बडा टेडा काम है कि क्या वाकई में लोग सही कर रहे है। ऐसे ही एक दिन एक लड़की की धीमी आवाज में आने वाले फोन ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। ऐसा नहीं है कि किसी लड़की ने पहली बार फोन किया था, पर उसकी मुझसे अपेक्षा देख मैं इस प्यार के शब्द पर सोचने को मजबूर हो गया।

पिछले छह माह में दो प्रतिष्ठित अखबारों में क्राइम रिपोर्टिंग कर चुका हूं। प्यार और उसकी वजह से होने वाले अपराधों से जुड़ें अनेको मामले देख चुका हूं। जितने भी मामले सामने आए उसमें से इस तरह का दूसरा मामला था। एक बार पहले मामले के बारे में बता दूं कि वह भी एक लड़की ने करीब दो माह पहले किया था, लेकिन उसने मेरा ध्यान केवल इस वजह से खींचा कि यदि हमने उसकी मदद नहीं की तो वह आत्महत्या कर लेगी। भला रिपोर्टर के अलावा हम भी तो इंसान है। कैसे किसी को ऐसे ही मरने के लिए छोड़ सकते है। उसने रोते हुए जब ऐसी बात कह दी तो हमने उसे भरोसा दिलाया और क्या मदद कर सकते है पूछा तो मुरलीपुरा निवासी रीटा चौधरी नामक उस लड़की ने रोते हुए बताया कि उसके घर वाले उसे बेच रहे है। एक रिपोर्टर के लिए इससे बड़ी सूचना और क्या हो सकती है कि किसी लड़की को बेचा जा रहा हो और उसकी जानकारी खुद लड़की दे रही हो। मैंने जैसे तैसे उसे शांत कराया और उससे जानकारी ली तो उसने एक लड़के से प्यार का जिक्र किया। हमें लगा कि संभव हो उस लड़के से शादी नहीं कराने को लेकर परिजन इस हैवानियत पर आ गए कि लड़की को बेचने के लिए तैयार हो गए।

हमने ये बात हमारे बॉस को बताई तो उन्होंने बताया कि जमीन और जोरू इनसे सावधान रहने की ज्यादा जरूरत है। ये तो हम भी समझते है कि जमीन की कीमत और लड़की के मन का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता, लेकिन हमेशा ऐसा कहकर अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं भाग सकते। हमने काफी सोचा इस दौरान कई दफा उस लड़की के फोन आए और हम उसे झूठी तसल्ली देते रहे। आखिरकार हमने उस लड़की को थाने के नंबर देकर मदद की गुहार लगाने को कहा तो उसने बताया कि मेरे पापा खुद इस थाने में ही इसलिए कुछ नहीं हो सकता। हम तो और भी परेशान हो गए कि पुलिसवाला अपनी ही जवान बेटी को आखिर बेच क्यूं रहा है। हमने उसे एक मोबाइल नंबर देकर अपनी परेशानी बताने के लिए कहा।

इसके बाद हमने आईजी बीएल सोनी से इस मामले की बात की और लड़की के नंबर दे दिए। करीब तीन घंटे बाद आईजी सोनी का फोन आया और बोला कि आपको सूचना किसने दी। मैंने लड़की के बारे में बताया। आईजी ने पूछा कि उसको मेरे नंबर आप ही ने दिए है क्या तो मैंने हां कहा। सोनी में मुझसे कहा कि आपके फोन आने के बाद उसका लड़की का फोन आया था। जब उसने मुझे पोजीशन बताई तो मैंने यहां से एडिशनल एसपी को भेजा था। मैंने उन्हें कहा कि जब वहां से जानकारी आ जाए तो एकबारगी मुझे भी इत्तला कर देना ताकि उसे हम भी देखें की क्या वजह थी। शाम को आईजी सोनी का फोन आया कि सारा मामला सुलट गया है। हमने पूछा कि क्या रहा तो बताया कि लड़की एमए पढ़ी लिखी २१ साल की थी। वह किसी मुस्लिम लड़के से मोहब्बत करने लगी। हमने उस लड़के को भी बुलाया तो पता लगा कि उसकी शादी पांच साल पहले हो चुकी थी। उसके दो बच्चे है और आठवीं जमात ही पास है। लड़की को उसकी शादीशुदा जिंदगी के बारे में मालूमात ही नहीं थी। धोखे में रखकर किया गया ये भी प्यार था। उसके बाद सब कुछ सही हो गया।

ठीक दो महीने बाद फिर एक और फोन आया जिसने फिर से मेरा ध्यान खींचा। वो मुरलीपुरा जैसे इलाके से था तो इस बार आगरा रोड पर जामड़ोली जैसे क्षेत्र से।
इस बार भी दबी हुई आवाज और रोते हुए कह रही हो मुझे तो बचाना जरूरी नहीं उसे जरूर बचा लो। उसे कौन? इसी सवाल पर हम उसे कुरेदते गए और परतें खुलती गई। मालियों की लड़की नाम गुणवंती, अपने आपको बीए पढ़ी-लिखी बता रही थी। लड़का मीणों की ढाणी में रहने वाला था जो उसी समाज का था। आठवीं पढ़ा लिखा लेकिन मजदूरी कर पट पालता था। कहानी में ट्विस्ट ये है कि लड़की को लड़के की शादीशुदा जिंदगी के बारे में मालूम है। गुणवंती का कहना है कि उसकी छोटी उम्र में ही शादी कर दी गई। अब उसके दो बच्चे जरूर है लेकिन वो उसे तलाक देना चाहता है। हम दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते है। मुझे मेरे घरवालों ने कैद कर रखा है और उसे उसके समाज वालों ने। हालंाकि ये जानकारी दोनों के ही परिवार वालों को है। लेकिन पता नहीं क्यूं उसके समाज वालों ने उसको बंद कर रखा है। प्लीज उसे कैद से छुड़ा दो। जब मैंने उसे समझाने की कोशिश की तो कहा कि मुझे कुछ नहीं सुनना केवल उसे छुड़वा दो। मैंने गुणवंती को पुलिस में सूचना देने की बात कही तो उसने कहा कि पुलिस उसके समाजवालों से मिली हुई है। आखिर इस कहानी का आधार भी वहीं प्यार है जो आंखों पर पट्टी बांधे किया जा रहा है। मैंने इस बारे मेंं काफी सोचा कि क्या लड़की पहली पत्नि को तलाश दिलवाकर बीच राह में छोड़ देना और किसी कुंआरी लड़की से शादी करना जायज है। उन दो बच्चों का क्या कसूर है। उस पत्नी का क्या दोष है जो अपने घर को छोड़ पति के सहारे रह रही है।

मैंने उसकी कहानी को सुना और मदद करने का आश्वासन देने के बाद फोन काट दिया। दो दिन बाद फिर वहीं फोन आया, आखिर हमने पूछा कि हम उसे छुड़वा देंगे, लेकिन तुम उसे छोड़ दोगी? उसका कहना था कि इस बारें में आपको कुछ नहीं कह सकती। हम दोनोंं राजी है तो फिर पता नहीं क्यों लोग हमारे बीच में आ रहे है। मैंने उसे समझाया कि कहीं तुम समझना नहीं चाह रही इसका मतलब कोई गलती तो नहीं कर बैठी, उसने मुझसे ही कुरेदना शुरू कर दिया कि गलती कैसी? जब हमने बात घुमायी और उसे साफ कह दिया कि यदि तुम उस लड़के की जिंदगी से दूर हो जाओं तो मैं उसे कैद मुक्त करवा सकता हूं,वरना तुम्हारे लिए किसी का परिवार नहीं उजाड़ सकता। पर वो केवल मुझे नाम पता देती रही और उसे कैद से मुक्त कराने की कहती रही।

Saturday, June 5, 2010

संस्थान-छात्र फर्जी, छात्रवृत्ति असली

](30/05/2010)
प्लॉट नंबर सी-242, 243 सिंहभूमि, खातीपुरा पर एक सैकंडरी स्कूल है, जिस पर अबेकस एकेडमी का बोर्ड लगा है, जबकि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग (पुराना नाम समाज कल्याण विभाग) के रिकॉर्ड के मुताबिक यहां मेडिकल टेक्नालॉजी एंड नर्सिग एजूकेशन नाम का इंस्टीट्यूट होना चाहिए। यह वही इंस्टीट्यूट है, जिसने वर्ष 2007-08 में 18 अनुसूचित जनजाति (एसटी) छात्रों के नाम 8,39,610 रुपए तो 2008-2009 में 17 एसटी छात्रों के नाम पर 7,58,060 रुपए उठाए गए थे। मजे की बात यह है कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग अधिकारियों ने इस कॉलेज का फिजीकल वेरीफिकेशन भी किया है।

फर्जी संस्थान और अनुसूचित जाति के फर्जी छात्रों के नाम पर लाखों रुपए की छात्रवृत्ति हड़पने की जानकारी मिलने पर डीबी स्टार टीम ने पखवाड़े भर तक मामले की तहकीकात की। टीम ने समाज कल्याण विभाग के रिकॉर्ड से कुछ संदिग्ध संस्थानों के नाम छांटकर उनका वेरीफिकेशन किया। हकीकत सामने आई कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से लाखों रुपए की छात्रवृत्ति की बंदरबांट हो रही है। अगर अब तक वितरित छात्रवृत्ति की जांच कराई जाए तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे और करोड़ों रुपए का घपला भी उजागर होगा।

फिलहाल डीबी स्टार की तहकीकात में जो तथ्य सामने आए हैं, उनके मुताबिक पिछले कई सालों से जिन नर्सिग, मेडिकल संस्थानों के छात्रों को सरकार छात्रवृत्ति प्रदान कर रही है, दरअसल उनमें से कई का तो अता-पता ही नहीं है। कई संस्थानों को संबंधित एजेंसी या विभाग से मान्यता ही नहीं मिली है। ऐसे में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि विभागीय अधिकारी लाखों रुपए किसे बांट रहे हैं? जिन अधिकारियों पर जरूरतमंद छात्रों को छात्रवृत्ति देने का दारोमदार है, उनकी मिलीभगत के बगैर क्या इतने फर्जी संस्थानों को छात्रवृत्तियां जारी हो सकती थीं?

जिस तरह से छात्रवृत्ति वितरण में अंधेरगर्दी चल रही है, उससे साफ है कि भ्रष्ट ताकतों को सरकार में बैठे आला अफसरों का संरक्षण भी मिल रहा है। खातीपुरा स्थित नर्सिग इंस्टीट्यूट की तरह डीबी स्टार टीम, सीतापुरा स्थित विनायक डेंटल कॉलेज को रीको इंडस्ट्रियल एरिया में तलाशने निकली तो उसका समाज कल्याण विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज पते पर अस्तित्व नहीं मिला। यही हाल श्री कृष्णा कॉलेज ऑफ नर्सिग, कोटपूतली के मामले में मिला। मामले में पूछताछ करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क साधने के लिए टीम सोमवार को झालाना स्थित छात्रवृत्ति कार्यालय पर पहुंची तो एक-दो कर्मचारियों के अलावा कोई नहीं मिला।

वहां गार्ड से उपनिदेशक बीपी मीणा से मिलाने के लिए कहा गया तो जवाब मिला कि साहब किसी संगोष्ठी में शामिल होने के लिए गए हैं, शाम को लौटेंगे। उसके बाद टीम ने आगे के दिनों में कई विभागीय अधिकारियों से पूछताछ की। ज्यादातर अधिकारी मुंह तक खोलने को तैयार नहीं हुए। उनका कहना था कि यह कोई नई बात नहीं है। ऊपर वालों को भी सब पता है, उनका हिस्सा भी तो जाता है। कुल मिलाकर पूरे कुएं में भांग घुली नजर आई। इसके अलावा, भ्रष्टाचार से परेशान जिन अधिकारियों न मुंह खोला, ऑफ द रिकॉर्ड विभाग की पूरी पोल पट्टी ही खोल कर रख दी। फिलहाल हम यहां तहकीकात और बातचीत के वही अंश दे रहे हैं, जो रिकॉर्ड हैं।

भले विभाग को चंद लोगों ने बदनाम कर दिया

पीएस मेहरा, आयुक्त, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से सवाल

हमें जानकारी मिली है कि कुछ संस्थानों ने फर्जी दस्तावेज से छात्रवृत्ति उठाई है?
नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता। ऐसा कोई मामला सामने आता तो मुझे भी जानकारी होती।

लेकिन हमारे पास दस्तावेज हैं जो इस बात की चुगली कर रहे हैं कि लाखों रुपए छात्रवृत्ति के उठाए गए हैं?
आप मुझे जानकारी दें, ये तो सरासर फर्जीवाड़ा है। इसकी जांच कर संबंधित अधिकारी-कर्मचारी पर कार्रवाई जरूर होगी।
इससे पहले भी कई प्रकरण सामने आए हैं,उनमें भी तो आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई़
मैंने सभी मामलों की जांच के आदेश कर दिए थे। जांच चल रही है, रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई जरूर की जाएगी। वैसे भी समाज का भला करने वाले विभाग को चंद लोगों ने बदनाम कर रखा है। उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

दो साल पहले तत्कालीन कमिश्नर ने विभाग में भ्रष्टाचार का मामला नजर आने पर थाने में एफआईआर दर्ज कराने के आदेश निकाले थे, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई?
हां..आप ठीक कह रहे हैं। ऐसे आदेश निकाले हैं, लेकिन कोई मामला दर्ज ही नहीं हुआ। इसके मायने ये हंैं कि विभाग की नजर में कोई भ्रष्टाचार नहीं है।

लेकिन मामले तो लगातार सामने आ रहे हैं?
जानकारी करवाता हूं। छात्रवृत्ति मामले में गलत हुआ है तो कार्रवाई जरूर होगी।

विभाग ने रोक दिया
डॉ. शिवराज (पूर्व संचालक) से सवाल

आपके इंस्टीट्यूट के छात्रों के नाम से समाज कल्याण विभाग से लाखों रुपए की छात्रवृत्ति उठाई गई है?
मुझे पता नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।

ऐसा ही है, हमारे पास कागजात हैं?
अब पुरानी बातों का क्या फायदा, मैं इंस्टीट्यूट तो बेच चुका हूं।

ठीक है, हम खरीदार से पूछेंगे, मगर छात्रवृत्ति इंस्टीट्यूट बिकने से पहले उठाई गई है?
देखिए हमें कुछ याद नहीं है। कुचामन, नागौर में हमारा एक इंस्टीट्यूट और है, उसमें शैलेंद्र नाम के कर्मचारी ने ऐसी हरकत की थी। जानकारी में आने पर हमने उसकी शिकायत थाने में करने के लिए शिकायत दी थी, लेकिन समाज कल्याण विभाग ने ऐसा करने से रोक दिया था।

हमने हाल ही कॉलेज खरीदा है
रामबाबू शर्मा, निदेशक, मेडिकल एंड इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिग से सवाल

क्या आपके कॉलेज को आईएनसी से मान्यता प्राप्त है?
हां..30 सितम्बर 2009 में ही मान्यता मिली है।

लेकिन आपकी कॉलेज के नाम पर तो पिछले दो सालों से स्कॉलरशिप उठाई जा रही है?
ऐसा कैसे हो सकता है। हमने तो ये कॉलेज हाल ही में खरीदा है।

खरीदा है क्या मतलब?
पहले ये कॉलेज कोई और सोसायटी चलाती थी, उसे हमने खरीद लिया। इसके बाद रजिस्ट्रेशन की कवायद शुरू कर दी।

लेकिन कॉलेज छात्रों के नाम दो सत्रों में करीब 15 लाख रुपए की छात्रवृत्ति उठाई गई है, इसके लिए किसको जिम्मेदार माना जाए?
हमने तो छात्रों को स्कॉलरशिप के लिए अभी आवेदन ही किया है। छात्रवृत्ति के लिए समाज कल्याण विभाग में बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। यदि किसी को छात्रवृत्ति गलत जारी की गई है तो विभाग के लोगों की ही जिम्मेदारी है।

कॉलेज खरीदा तब जानकारी नहीं थी कि कुछ फर्जीवाड़ा हो रखा है?
नहीं हमें कल ही समाज कल्याण विभाग के एक अधिकारी ने फोन कर छात्रवृत्तियों के बारे में पूछताछ की तब पता लगा।

मैंने रिकॉर्ड चैक करवा लिए हैं। मेडिकल एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिग खातीपुरा, जयपुर व श्री कृष्णा कॉलेज ऑफ नर्सिग, कोटपूतली नाम के किसी इंस्टीट्यूट को उनके यहां से मान्यता नहीं मिली हुई है। - दयाशंकर शर्मा, रजिस्ट्रार, राजस्थान नर्सिग कौंसिल

Sunday, May 2, 2010

बचा लो मुझे... मैं पानी हूं

हां मेरा नाम पानी है।
मेरे अतीत की एक कहानी है।।
मेरे पिता कहते है, वंश हमारा सुसुप्त होने जा रहा है।
हंसता-खेलता कुनबा लुप्त होने जा रहा है।।
आपके जुल्मों से मैं बहुत छला गया।
इसलिए सबसे पहले आंखों से चला गया।।
क्योंकि आपने किया है मेरा दुरूपयोग, बरबादी।
आज की पोजीशन आप स्वयं ने ला दी।।
कभी मेरा सम्मान था।
इस बात पर मुझे गुमान था।।
मैं कुएं से निकाला जाता था।
तब मैं नीचाई से ऊंचाई की ओर आता था।।
मटकों में डालने के लिए मेरा सिर ऊंचा किया जाता था।
तब मैं फूला नहीं समाता था।।
नई नवेलियों के सिर पर मटकों में झूल जाता था।
गर्व से मेरा सीना फूल जाता था।।
लोग मुझे लोटा गिलास में सम्मान से सजाते थे।
मेरी कद्र करते थे, व्यर्थ नहीं बहाते थे।।
तब मैंने कभी अभाव का रोना नहीं रोया।
अपना आपा कभी नहीं खोया।।
पहले में बहुत था, आपकी आस था।
आपसे दूर नहीं, बल्कि आपके पास था।।
लोग अनायास ही मेरा सपना पाल लेते थे।
दस बीस फीट खोदकर मुझे निकाल लेते थे।।
क्योंकि तब आप मेरा सम्मान करते थे, व्यर्थ नहीं बहाते थे।
लोटा गिलास में सजाते थे, कम से ही काम चलाते थे।।
समय ने करवट बदला, मुझे व्यवस्था ने जकड़ा।
मेरा पथ टेकी, पाइप और टूंटी ने पकड़ा।।
अब मैं टंकी की ऊंचाई से नीचाई पर लाया गया।
मैं अपमानित हुआ, मुझ पर जुल्म ढ़हाया गया।।
पाइप के लीकेज मुंह चिढ़ाने लगे।
मुझे अनावश्यक ही बहाने लगे।
टूटी टंूटियों से यूं ही बहता रहा।
अपनी दर्द भरी कहानी कहता रहा।।
पाइप के लीकेज से सड़क पर सागर बन गया।
वक्त के थपेड़ों से सरिता से गागर बन गया।।
सभी को बता देना, मैं पानी हूं।
गुजरे वक्त की एक कहानी हूं।।
मुझे बूंद-बूंद बचाना तुम्हारे काम आऊंगा।
नहीं तो तुमसे दूर-बहुत दूर चला जाऊंगा।।
मुझे पाने के लिए आपकी आंखें बरसेंगी।
पानी-पानी कहकर आपकी पीढियां तरसेंगी।।
साभार- अब्दुल अय्यूब गौरी, जयपुर

वोल्वो नहीं डीलक्स प्लीज...

रोडवेज बसों को खत्म कर रहा अपने बेड़े से
आम आदमी की यात्रा हुई महंगी
निजी बसों को फायदा पहुंचाने के लिए राजस्थान रोडवेज ने डीलक्स बसों की खरीद बंद कर दी है। ये हम नहीं कह रहे बल्कि रोडवेज के ही आंकड़े इस बात का खुलासा कर रहे है। आंकड़ों से साफ है कि पिछले दो साल में करीब १८०० बसों की खरीद के लिए अनुमति मिलने के बाद भी रोडवेज प्रशासन ने एक भी डीलक्स बस नहीं खरीदी।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बजट वर्ष २००७-०८ से पूर्व रोडवेज प्रशासन करीब ५० डीलक्स बसों की सालाना खरीद करता था। जिससे यात्रियों को खटारा और पुरानी बसों की जगह नई बसों की सुविधा मिल सके। वर्ष २००७-०८ में राज्य सरकार से अनुमति मिलने के कारण किसी भी श्रेणी की बस नहीं खरीदी गई। इसके बाद रोडवेज को वर्ष २००८-०९ में राज्य सरकार ने ११५० बसों को खरीद करने की अनुमति मिली, इन बसों में ५० बसें डीलक्स व एसी बनवाई जानी थी, लेकिन रोडवेज प्रशासन ने इस और बेरुखी अपनाई। रोडवेज ने स्वीकृत की गई ११५० बसें एक्सप्रेस कैटेगरी की तैयार करवा ली। चालू सत्र में भी सरकार ने रोडवेज को ६५० बसें खरीदने को हरी झंडी दे दी, लेकिन रोडवेज इस बार भी डीलक्स और एसी बसें खरीदने में रूचि नहीं दिखा रहा हैं।
किराए का अंतर --जयपुर से दिल्ली का किराया डीलक्स - ३०० रुपए, एसी - ४०० रुपए व वोल्वो -५५० रुपए है। डीलक्स बसें नहीं होने से मध्यम वर्गीय लोगों के लिए सस्ती यात्रा का विकल्प समाप्त हो गया, जिसका फायदा निजी बस ऑपरेटर्स उठा रहे है। डीलक्स बसों का रूट जयपुर-कोटा, जयपुर-जोधपुर, जयपुर- आगरा ही रहता था। यही कारण है कि पिछले सालों में हाइवे पर दौडऩे वाली रोडवेज की डीलक्स बसों की संख्या मात्र २ रह गई है। जबकि पिछले कुछ साल पहले इनकी संख्या १६ से १८ हुआ करती थी। निजी बस ऑपरेटर्स रोडवेज से कम्पीटिशन के फेर में अपनी रेट्स कम रखते थे, लेकिन जब सरकारी एजेंसी ही फेल हो गई तो उन्होंने भी मनमानी दरें बढ़ाकर मध्यमवर्गीय लोगोंं की जेब पर वजन डाल दिया।
यह है तकनीकी कारण
डीलक्स बसें ५ किलोमीटर चलने के बाद तकनीकी तौर पर सेमी डीलक्स किराए पर संचालित होती है, क्योंकि बसों का स्तर डीलक्स के मुताबिक नहीं रहता। ऐसे में रोडवेज ८० फीसदी से ज्यादा डीलक्स बसों को सेमी डीलक्स बसों के किराए पर ही संचालित कर रहा है। जिम्मेदारी से बचने के लिए डीलक्स जोन के मैनेजर ने दिल्ली व आगरा हाइवे को छोड़कर दूसरे मार्गो पर चलने वाली डीलक्स बसों को अन्य आगारों में ट्रांसफर कर दिया। रोडवेज प्रशासन एसी व वोल्वों बसों पर ही ध्यान दे रहे है जबकि मध्यम श्रेणी के यात्रियों को रोडवेज प्रशासन के कारण महंगी यात्रा करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

सीएमओ से गायब होती हैं पत्रावलियां!

मुख्य सूचना आयुक्त ने दिया आदेश जांच कर तय करें जिम्मेदारी
मुख्यमंत्री कार्यालय से कभी भी कोई जरूरी दस्तावेज गायब हो सकते है। प्रदेशवासियों की ओर से मुख्यमंत्री को भेजे जाने वाले ज्ञापन और शिकायती पत्रों को संभालने की जिम्मेदारी भी तय नहीं है। ये हम नहीं कह रहे बल्कि मुख्य सूचना आयुक्त की ओर से हाल ही जारी एक आदेश का आशय तो यही निकलता है। आदेश में साफ लिखा है कि सबूतों के आधार पर तो प्रार्थी केे पत्र सचिवालय को भेजे गए है, जबकि जवाब में किसी भी तरह का कोई भी ज्ञापन फैक्स, स्पीड पोस्ट मिलने से इनकार कर दिया।
जानकारी के अनुसार स्वेज फार्म संयुक्त महासंघ के अध्यक्ष संजय शर्मा ने २६ अप्रैल २००८ को स्पीड पोस्ट के जरिए ८८ पेजों का एक शिकायत पत्र भेजा था। पत्र में तीन आवासीय योजनाओं में कुछ प्रशासनिक अधिकारियों पर मिलीभगत कर पद के दुरूपयोग की शिकायत की थी। उसके बाद महासंघ के प्रतिनिधि मंडल ने ४ अगस्त, ०८ मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिव को ज्ञापन सौंपा गया। शर्मा ने १५ दिसम्बर, ०८ को सीएमओ में फैक्स कर अपनी शिकायत दर्ज कराई। लंबे अंतराल के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होते देख शर्मा ने मार्च, ०९ को सूचना के अधिकार में मुख्यमंत्री कार्यालय से तीनों शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई इसकी जानकारी मांगी। जब निर्धारित अवधि में सूचना नहीं दी गई तो प्रथम अपील अधिकारी के सामने अपील की, वहां भी कोई जवाब सीएमओ से नहीं आया। उसके बाद शर्मा ने मुख्य सूचना आयुक्त के सामने अपील की। सूचना आयोग की ओर से भेजे गए नोटिस का मुख्यमंत्री कार्यालय ने जवाब दिया कि विभिन्न तरीकों से भेजे गए तीनों ही पत्र प्राप्त नहीं हुए है। सुनवाई में शर्मा ने फैक्स और स्पीड पोस्ट की रसीदें दिखाई।
उपस्थित ही नहीं
सूचना के अधिकार के प्रति मुख्यमंत्री भले ही सम्मान करते हो, लेकिन उनके कार्यालय में तैनात अधिकारियों को ऐसा नहीं लगता। यही कारण है कि आयोग की सुनवाई में मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से पक्ष रखने के लिए कोई उपस्थित नहीं था। जानकारों का कहना है कि जब जिम्मेदार लोग ही कानून की इस तरह से अवहेलना करेंगे तो और सरकारी विभागों से क्या अपेक्षा की जा सकती है।
ये दिया आदेश
आयोग के अध्यक्ष एमडी कौरानी ने नरम रूख अपनाते हुए लिखा कि मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारी जांच करवाए कि उनके कार्यालय में पत्र मिलने के बाद भी उपलब्ध क्यों नहीं हो रहा है। जिस रजिस्टर्ड पत्र का संदर्भ दिया गया है वह पार्सल उनके कार्यालय में प्राप्त हुआ था या नहीं। यदि नहीं हुआ तो समस्त पत्रादि कहां गए। यह जांच कर उत्तरदायित्व निर्धारित करते हुए अग्रिम कार्यवाही करवाई जाए।

Saturday, April 24, 2010

देह व्यापार की जकड़ में राजधानी

सच्ची कहानी जो एक लड़की की जिंदगी में काला सच बनकर आई
शहर में बढ़ती वारदातों की तह में जाने पर निकली सच्चाई
मैं राजधानी के एक इलाके में मध्यम वर्र्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हूं। खूबसूरत होने के साथ ही यौवन की दहलीज पर भी पैर रख दिया था। यही कारण था कि परिवार आर्थिक स्तर कमजोर होने से छोटी-छोटी चीजों के लिए उन पर निर्भरता समाप्त करने की इच्छा रहती थी। लड़कियों की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर अपनी गिद्ध जैसी नजरें गढाए जानवर सरीखे लोग मौके की तलाश में बैठे रहते है। पलभर की चुप्पी जीवनभर को आंसुओं में डुबाने के लिए काफी होते है। ऐसे ही एक गिरोह की गिरफ्त में आने के बाद उनके बाद अपने आप को आजाद मानकर सादा जीवन जीनें की आस जगाई थी, लेकिन आए दिन अनजाने लोगों के फोन आने और परेशान करने पर मैं टूट चुकी हूं। कभी आत्महत्या करने का विचार आता है तो परिवार के लोगों को देख हिम्मत जवाब दे जाती है। चेहरे पर आने वाली हलकी सी हंसी पता नहीं उन लोगों को क्यों बुरी लगती है कि किसी न किसी तरीके से अतीत सामने ला देते है। उसी अतीत को सबके बीच शेयर करके मैं सहानुभूति नहीं बटोरना चाहती, मैं तो चाहती हूं कि वे लड़कियां जो अपने परिवार का सहारा बनना चाहती है बाजार में बैठे भूखे दरिंदों को पहचाने और उनके हाथों मेंं अपने आप को झूलने नहीं दे। मैं जालिमों को सजा देने जैसी बात पुलिस महकमे से इसलिए नहीं कहूंगी कि ज्यादातर काम उन्हीं की सरपरस्ती में होते है। अपनों पर जुल्म से छुटकारा पाने के लिए जब मीडिया को सहारा माना तो कड़वी सच्चाई ये निकलकर आई कि बगैर किसी सबूत के कुछ भी कर पाने में वे भी अपंग है। अपने शरीर को खिलौना बनने से पहले बचकर मैंने शायद गलती की। या उन शैतानों के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत क्यों कर रही हूं। ऐसे सवाल है जो मेरे जेहन में टनों वजनी पत्थर के माफिक लगते है।
मैं पूनम (बदला हुआ नाम)अपनी जिंदगी के कड़वे सच के बारे मेंं कुछ बताना चाहती हूं। जो कुछ मेरे साथ हुआ वो किसी और के साथ न हो। किसी के विश्वास को कोई हवस का शिकार बना दें तो दुबारा वो किसी पर चाहकर भी विश्वास नहीं कर पाती। मेरे साथ भी एक ऐसा ही हादसा हुआ है जिसके बाद मेरा किसी पर विश्वास करना मुश्किल हो गया।
कॉलेज में पढ़ते समय मैंने एक फेयर में जॉब प्लेसमेंट की सर्विस ली। उस फेयर के कुछ दिनों बाद मेरे पास जॉब के लिए फोन से ऑफर आया। फोन पर बात की तो एक शख्स बोला जिसने अपना नाम सन्नी बताया और बोला कि मैं मॉडलिंग करता हूं। जब मैंने उससे अपना नाम और नंबर की जानकारी देने की बात पूछी तो उसने बताया कि आपने जो फेयर में जॉब सर्विस के लिए अप्लाई किया था वहीं से जानकारी मिली है। मैंने सन्नी से फोन करने का कारण पूछा तो उसने बताया कि हम लोग शहर में एक ऑफिस खोल रहे है। जिसकी ऑपनिंग हो चुकी है। उसके लिए रिसेप्शन पर एक खूबसूरत लड़की चाहिए, आप जॉब करना चाहती है तो इंटरव्यू देने आ सकती है। मैंने इस बारे में सोच कर बता दूंगी कहा और फोन काट दिया। उसके बाद करीब-करीब रोजाना ही फोन आने लगा और एक बार इंटरव्यू देकर जॉब देख लेने के लिए समझाने लगा। आखिरकार मेंने इंटरव्यू के लिए उससे एड्रेस पूछा तो उसने जो बताया वो मुझे समझ नहीं आया। उसने मुझे कंवेंस करते हुए पोलो विक्ट्री पहुंचने के लिए कहा। उसने बताया कि वहीं से एक लड़की और इंटरव्यू के लिए आ रही हैं। दोनों को लेने के लिए मैं अपने स्टाफर्स को भेज दूंगा।
फोन बात करने के हिसाब से मैं पोलो विक्ट्री तिराहे पर पहुंच गई। करीब १५ मिनिट बाद एक लंबी सी पतली लड़की जो ज्यादा खुबसूरत तो नहीं थी, लेकिन बात करने में एक्सपर्ट सी लग रही थी। वहां पर आई। उससे इंटरव्यू के बारे में बातें की करीब १० मिनिट बाद उसके फोन पर सन्नी का फोन आया। उनके बात करने के करीब ५ मिनिट बाद ही एक लड़का मोटरसाइकिल से हमें लेने वहां पहुंच गया। हम दोनों उसकी बाइक पर बैठकर चल दिए। बाइक चलाने वाला युवक कई रास्तों से होता हुआ टोंक फाटक पुलिया की तरफ लेकर आया। पुलिया पार करके उसने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी और दूर जाकर मोबाइल पर किसी से बात की। थोड़ी देर बाद वहीं पर एक और लड़का आया। मुझे उस लड़के को देखकर अच्छा नहीं लगा तो मैंने साथ वाली लड़की से वापिस लौट चलने के लिए कहा। लड़की ने समझाया कि यहां तक आ ही गए है तो इंटरव्यू देकर चलते है। मैं भी उसके इस तर्क को मान गई। हम दोनों पैदल वाले लड़के के साथ चल दिए। वो लड़का हमें किसी ऑफिस में ले जाने की बजाय किसी घर में ले गया। देखने में ही नजर आ रहा था कि जहां हमें लाया गया है वो किराए पर है। मुझे वहां का माहौल देखकर संदेह हुआ, लेकिन साथ में एक और लड़की होने के कारण डर नहीं लगा। घर में ऊपर की ओर एक कमरा बना था जिसमें तीन लड़के बैठे हुए थे। थोड़ी देर तो वो हमसे नहीं बोले, लेकिन कुछ देर बाद एक ने दूसरे को इशारा किया तो एक लड़का किसी काम की कहकर कमरे से बाहर निकल गया। उसके बाद मेरे साथ वाली लड़की को उसने कुछ इशारा किया। लड़की ने बगैर कुछ किए अंदर बने एक कमरे में चली गई और वहां से तीन ग्लास कोल्ड ड्रिंक बनाकर ले आई। हम तीन लोगों ने कोल्ड ड्रिंक साथ बैठकर ही पी और उसके बाद उस लड़की को इंटरव्यू देने के लिए अंदर ही बने एक और कमरे में भेज दिया। थोड़ी दूर बैठा हुआ सन्नी नाम का युवक मेरे करीब आकर बैठ गया। इस बीच मेरे साथ आने वाली लड़की अंदर वाले कमरे से बाहर आई और कुछ ढूंढकर वापिस कमरे में चली गई, उसने दरवाजा भी बंद कर लिया। मुझे अचानक सिर भारी लगने लगा, ऐसा लगा जैसे धरती हिल रही हो। इस बात की जानकारी मैंने सन्नी को दी। उसने हमदर्दी जताते हुए मुझे अपने हाथों में जकड़ लिया और अपनी तरफ खींचने लगा। उसके बाद जैसे-जैसे दिमाग ज्यादा घूम रहा था सन्नी मेरे कपड़े खोलने लगा। मैं अपने आप को उससे छुटकारा पाने के लिए हाथ पैर चला रही थी, लेकिन नशे में होने के कारण जैसे हिम्मत ही नहीं रही हो। मुझे अहसास हुआ कि मेरे कमर से ऊपर के सभी तरह के कपड़े उतार लिए गए है। मुझे ऐसा लगा कि वो मेरे नीचे के कपड़े भी खोल रहा है तो मैं अपने आपको नियंत्रित करने की कोशिश करने लगी। मुझे होश आता दिख रहा था, इस दौरान मेरे हाथों में कोल्ड ड्रिंक का खाली गिलास आ गया। जिसे मैंने उठाकर जोर से फेंक दिया, ऐसा लगा जैसे वो गिलास दरवाजे से टकराया हो। छीना झपटी करते हुए मेंरे काफी खंरोंचे भी आई। दरवाजे पर जोर की आवाज सुनकर मकान मालकिन ने कमरे का दरवाजा खोलने की आवाज लगाना शुरू कर दिया। जब कुछ देर गेट नहीं खोला मैंरी आवाजें जोर-जोर से आने लगी तो मकान मालकिन और उनकी बहु दरवाजे के बाहर आकर तेजी से हिलाया। ये मुझे याद नहीं की दरवाजा किसने खोला लेकिन मकान मालकिन और उनकी बहु ने मुझे संभाला और कपड़े पहनाए। जब उन्होंने मेरे साथ वाली लड़की के लिए पूछा तो मैंने अंदर वाले कमरे की ओर इशारा कर दिया। वो लड़की और उसके साथ दो लड़के कमरे से बाहर निकले। मैं नशे में होने के कारण कुछ बोल नहीं पा रही थी, मकान मालिक का लड़का नर्सिंग में था उसने मुझे थोड़ी देर सो जाने के लिए कहा। इस दौरान मकान मालकिन और उनकी बहु मेरे साथ थे। हरकत करने वाले लोग वहां से रफूचक्कर हो गए थे। जब नशा कम हो गया तो मकान मालिक और मालकिन दोनों ऑटो में मुझे मेरे घर तक छोडऩे आए। उन्होंने मुझे समझाया और उनके खिलाफ पुलिस में कार्रवाई करने के लिए भी कहा। जो नंबर मेरे पास थे, जो नाम पते उन्होंने बताए थे वे सभी फर्जी निकले। मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाई। इस हादसे को ना मैं अपने घर पर किसी को बता पाई और ना ही मैं किसी को कहने की हिम्मत जुटा पाई। क्योंकि जितना मैंने सोचा है उस लिहाज से सवालों की बौछार मुझे ही गलत ठहरा रही थी। मैं इतनी परेशान हो गई थी कि मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता था। मानसिक तनवा की इंतहा ही थी कि मैें सोने के लिए नींद की गोलियां खाने लगी थी और सिगरेट भी पीने लगी थी। मैं इतना भयभीत थी कि मैंने सुसाइड करने की कोशिश की। इसके लिए मैंने अपने ही घरवालों से दूरियां बनानी शुरू कर दी। यहां तक की अपने आपको मैंने एक कमरे में समेट लिया था। उस समय मुझे लगा कि क्यूं लोग बेटी के जन्म पर खुशियां नहीं मनाते। यहां तक की कुछ लोग तो बेटी के जन्म होने से पहले ही प्रसव कराने वाली दाई से उसे मारने के लिए कह देते थे। आज भी जब अखबारों में इस तरह की खबर पढ़ती हूं तो सिहर जाती हूं। आखिर मेरा वो गुजरा कल जो मेरी जिंदगी का अंधेरा था मेरे सामने आज भी खड़ा दिखाई देता है। कभी तो मुझे लगता है कि कोई मेरे कॉल्स आज भी टेप कर रहा है। यहां तक की अनजाने नंबरों से मुझे फोन किए जाते है।

Thursday, April 1, 2010

एटीएस के सीक्रेट फंड को लेकर सीेक्रेट वार

आतंकवादियों और देश विरोधी ताकतों तक पहुंचने के लिए खुफिया सूचना तंत्र विकसित करने के लिए राजस्थान एंटी टेरेररिस्ट स्क्वॉड (एटीएस) के लिए बनाया गए सीक्रेट सर्विस फंड (एसएस फंड) को लेकर आजकल एटीएस में जबरदस्त खींचतान मची हुई है। वित्तीय वर्ष 2009-2010 में एसएस फंड के लिए मिले 35 लाख रुपए के खर्चे की यूटलाइजेशन रिपोर्ट 16 मार्च को पुलिस मुख्यालय को भेजी जा चुकी है, जबकि विभाग से भास्कर को छन-छनकर मिल रही खबर के मुताबिक इस मद में अब तक के खर्चे के बाद अभी 24 लाख रुपए बचे हैं, जिसके लिए सभी अधिकारियों से एडवांस में खर्चे के बाउचर भरकर मांगे गए है। जिस तरह से एटीएस की सब छोटी-बड़ी अंदरूनी बातें मीडिया तक पहुंच रहीं हैं, यह इसलिए भी चिंताजनक है कि अगर ऐसे ही खीचतान चलती रही तो आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी।
एसएस फंड के मामले में किसने, कितने के बाउचर भर कर दिए और किसने नहीं भरे यह तो विभाग के अधिकारी जाने, मगर इसको लेकर एटीएस में पुलिस अधिकारी-कर्मचारी दो धड़े में बट गए हैं। एक धड़ा एसएस फंड से इस तरह से खर्च को लेकर पूरी तरह से इसकी मुखालफत करने में जुटा है तो दूसरा किसी तरह से मामला शांत कराने में लगा है।
मुखालफत करने वाले धड़े को लोग कहते हैं कि एसएस फंड का दुरुपयोग न हो इसके लिए आईजी एटीएस को तत्कालीन एडीजी एके जैन ने फंड के तिमाही आडिट के अधिकार दिए थे, जबकि वर्तमान एडीजी कपिल गर्ग ने दिसम्बर महीने में आईजी के एसएस फंड का तिमाही आडिट करने के बाद नया आदेश जारी करके आईजी का आडिट अधिकार छीन लिया। वे कहते हैं कि इससे फंड के दुरुपयोग की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। एसएस फंड का उपयोग आतंकियों के खिलाफ सूचनातंत्र विकसित करने के लिए किया जाना चाहिए, जबकि इसका इस्तेमाल आला अधिकारी फर्नीचर, काफी मशीन, टेलीवीजन, कार की लग्जरी बढ़ाने आदि में कर रहे हैं, इस पर रोक नहीं लगी तो आगे इसका दुरुपयोग और बढ़ेगा।
दूसरा धड़ा कहता है कि एसएस फंड अन आडिटेड फंड है। एटीएस के मुखिया जो भी कर रहे हैं, वे ठीक है। वे कहते हैं कि हो सकता है कि उनके काम करने का तरीका कानून सम्मत न हो लेकिन उनकी नीयत पर हमे कोई शक नहीं है।

किसने सूचना दी, मुझे बताइए

एटीएस एडीजी कपिल गर्ग से सवाल
फंड से खर्चे के मद में आपने एडवांस में वाऊचर भरने के निर्देश दिए है?
देखिए एटीएस में सब कुछ सीक्रेट है। इस बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकता।
हमें आपके विभाग के लोगों ने ही बताया है कि आपने शाखा के सभी अधिकारियों को बुलाकर ऐसे निर्देश दिए है?
मैं कह चुका हूं कि ये सीक्रेट मसले है। आपको जो भी जानकारी दे रहा है वह गलत कर रहा है। आप उसकी जानकारी मुझे दीजिए।

ये जानकारी दे दीजिए कि फंड का कितना रुपया बचा है और कितना खर्च हुआ?
फंड में खर्च करने के बारे में तो सरकार भी नहीं पूछ सकती। एटीएस को सुरक्षा की जिम्मेदारियों को देखते हुए सूचना के अधिकार से परे रखा गया है। आप सूचना देने वाले की जानकारी दें तो बेहतर होगा, क्योंकि ऐसे लोगों की इस शाखा में जरूरत नहीं है। ऐसे व्यक्ति हमारी गोपनीयता कभी भी भंग कर सकते है। जिससे हमारी कार्यप्रणाली बाधित होगी।


मुझसे क्यों उगलवाना चाहते हैं
आईजी डॉ. आलोक त्रिपाठी से सवाल
क्या सभी अधिकारियों को एडीजी ने फंड की धनराशि इस्तेमाल के लिए एडवांस में वाऊचर के निर्देश दिए है?
देखिए फंड की जानकारी देने के लिए एडीजी अधिकृत है। इस बारे में आप उनसे ही बात कीजिए।
लेकिन हम तो आपसे यह जानना चाह रहे है कि आपने भी कोई वाऊचर भरा है क्या?
यह सीके्रट ब्रांच है। यहां की कोई भी, कैसे भी जानकारी नहीं दे सकता।

एटीएस का गठन पर तत्कालीन एडीजी एके जैन ने एसएस फंड का दुरुपयोग रोकने के उद्देश्य से इसके तिमाही आडिट की जिम्मेदारी आईजी एटीएस को करने के अधिकार दिए थे। आपको तो एसएस फंड के आडिट का अधिकार है?
इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता।
मुझे जानकारी मिली है कि आपने 31 दिसम्बर को एसएएस फंड का आडिट किया था?
आप मुझसे जबरदस्ती कबूल करवाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं?
नहीं मेरा ये इरादा नहीं है, अच्छा ये बता दीजिए कि क्या आईजी के आडिट करने के अधिकार खत्म कर दिए गए हैं?
आप तो सब जानते हैं, मुझसे क्यों कहलवाना चाहते हैं?
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सामने लाओ मै भी तो जानू
डिप्टी एसपी दिलीप शर्मा से सवाल
आपने खुद तो खर्चे का एडवांस वाऊचर भरा ही औरों से भी भरवाया है?
नहीं मैंने किसी से जबरन वाऊचर नहीं भरवाए। वैसे भी आजकल कोई किसी की कहां मानता है।
लेकिन इंस्पेक्टर्स का कहना है कि आपने जबरन भरवाए है?
ऐसा कोई कह रहा है तो सामने लाओ, मैं भी तो जानू कि जबरन वाऊचर क्यों भरे है।
चलिए ठीक है ये तो मानते ही हो कि आपने वाऊचर भरा है, क्या ये कानूनी तौर पर गलत नहीं है?
गलत और सही का फैसला करने का अधिकार अधिकारियों को है। इस बारे में आप उनसे ही बात करो।

एएसपी हेमंत शर्मा
आपने कितने के बाउचर भरें है?
मैं इस महकमे में नया आया हू्ं, मैं इस बारे में कुछ नहीं बता सकता। आप उच्चाधिकारियों से पूछे।