Sunday, March 28, 2010

समान कायदा, अधिकारी का बदला नजरिया

केस संख्या - मानसरोवर के आवास संख्या ३१/८२/११ में सार्वजनिक छत पर निर्माण कर कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा था। २७ दिसम्बर, ०७ को नगर निगम कार्यालय में शिकायत की गई। आयुक्त के कहने पर निगम की विजिलेंस शाखा के जिम्मेदार अधिकारी और इलाके के जेईएन ने जांच कर हो रहे निर्माण को अतिक्रमण बताया।
केस संख्या - मानसरोवर के आवास संख्या ३१/८१/१२ में सार्वजनिक छत पर निर्र्माण की शिकायत आई तो टालने के लिए नगर निगम के जिम्मेदारों ने क्षेत्राधिकार आवासन मंडल का बताते हुए शिकायत वहां भेज दी। मंडल के उपआवासन आयुक्त ने मामले की जांच करवाकर निर्माण को अतिक्रमण मानते हुए नगर निगम को तोडऩे की जिम्मेदारी सौंप दी। निगम अधिकारियों ने मिलीभगत कर अतिक्रमण को अवैध निर्माण बताकर छत पर कब्जा करने वालों को बचा लिया।
कायदा समान, अधिकारियों की आंखों में फर्ख
सरकारी जमीन पर कब्जा करने को अतिक्रमण कहा जाता है, जबकि बगैर स्वीकृति के खुद की जमीन पर निर्माण करने को अवैध निर्माण। शहर के स्वरूप को बिगाडऩे वाले इन कारनामों को सरकार ने कानूनी तौर पर गलत माना है, लेकिन अफसरों की मिलीभगत से शहर में दोनों ही तरीके के काम धड़ल्ले से हो रहे है। शहर के बिगड़ रहे हालातों को देख सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से इस मामले में शपथ पत्र भी मांगा है।
केस स्टडी के दोनों मामलों पर नजर डाले तो दोनों एक जैसे ही मामले है लेकिन जिम्मेदार लोगों ने इसमें फर्ख पैदाकर अपनी बदनीयति उजागर कर दी। आवासन मंडल की मानसरोवर योजना में छत को सरकारी माना है। छत पर निर्माण करने को अतिक्रमण मान कर कार्रवाई की जाती है, लेकिन जहां अधिकारियों की निर्माण करने वालों से सैटिंग बैठ जाती है वहीं उस निर्माण को अवैध निर्माण कहकर अपराध को हल्का कर दिया जाता है। ...क्योंकि अवैध निर्माण को तो कंपाऊंड किया जा सकता है, लेकिन अतिक्रमण के मामले में तीन माह से तीन साल तक की कैद या 20 से 50 हजार रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। ऐसे में जिम्मेदार अधिकारी लोगों से मिलकर सरकारी छतों को खा रहे है।
पहले केस में जहां नगर निगम द्वारा राजस्थान नगर पालिका अधिनियम १९५९ की धारा २०३ के तहत अतिक्रमी को नोटिस दिया गया था जबकि नए कानून में समान मामलों में कार्रवाई के लिए राजस्थान नगर पालिका अधिनियम २००९ की धारा २४५ के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए थी। जिसमें अतिक्रमण करने के मामले तीन साल की सजा और २० हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। जिसे नगर निगम कम्पाउंड भी नहीं कर सकती है। परंतु अतिक्रमण और अतिक्रमी को बचाने के लिए उद्देश्य से गलत नोटिस दिया गया। इस तरह के कारनामों से जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही तो दिखाई दे रही है जबकि राजस्थान उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने शहर में हो रहे अतिक्रमण और अवैध निर्माणों के विरूद्ध स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लेकर २० अक्टूबर २००४ को निर्णय सुनाया गया था, जिसकी भी सीधे तौर पर अवमानना है।
बचाने का रास्ता पार्टी ने असर नहीं लिया
नगर निगम की ओर से अतिक्रमण और अवैध निर्माण की शिकायत पर भेजे जाने वाले नोटिस में निर्धारित समय के बाद भी कार्रवाई करने की बजाय लीपापोती करते है। इसका उदाहरण है ज्यादातर नोटिसों के जवाब में निगम अधिकारियों ने पार्टी द्वारा नोटिस का असर नहीं लेने जैसे जुमले प्रयोग कर खानापूर्ति की जा रही है। जबकि जवाब नहीं आने पर निगम अतिक्रण को स्वयं हटाने उस पर होने वाले खर्चे का अधिकारी है।
फाइल की कहानी भी अजीब
सरकारी छत पर हो रहे निर्माण शिकायत की एक फाइल डीबी स्टार को मिली। फाइल को देखा तो उसकी कहानी भी अजीब है। तत्कालीन महापौर पंकज जोशी ने सरकारी छत पर किए गए अनाधिकृत निर्माण के विरूद्ध तत्काल कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए तत्कालीन विजिलिेंस कमिश्नर संग्रामसिंह को लिखा। संग्रामसिंह ने यह कहते हुए अपना बचाव किया कि मानसरोवर जोन आयुक्त ही इस पर कार्रवाई कर सकते है। मानसरोवर जोन आयुक्त ने ९ नवम्बर, ०९ में अतिक्रमण को अवैध निर्माण बताकर नोटिस जारी कर दिया और तीन दिन में हटाने का अल्टीमेटम दिया। उसके बाद २१ नवंबर को नोटिस का सायल द्वारा असर नहीं लिया गया लिखकर चालान पेश कर दिया।
मानसरोवर जोन आयुक्त ओपी गुप्ता से सवाल
मानसरोवर योजना की छत नगर निगम की नजर में क्या है। अवैध निर्माण या अतिक्रमण?
सरकार की नजर में छत तो सरकारी है, जबकि आवासी इसे अपनी बताते है।
आपके जोन में सेम नेचर के मामले में अलग-अलग पैमाना क्यों है?
इसकी मुझे जानकारी नहीं है। मैं तो अभी जनवरी में ही यहां आया हूं। जानकारी करने के बाद ही कुछ कह पाऊंगा।
लेकिन अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई तो होती ही नहीं?
नहीं ऐसा नहीं है। शिकायत आने के बाद कार्रवाई जरूर होती है।
लेकिन दोनों ही मामलों में आज तक कोई तुड़ाई नहीं हुई?
इसकी फाइल देखकर ही कुछ कह सकता हूं

Monday, March 22, 2010

अब इस नृत्यांगना की बारी!

दो साल में अब तक रामबाग चौराहे पर दो दफा हो चुकी है चोरी
रामबाग सर्किल पर लगी तीज सवारी के स्कल्पचर्स में से दो दफा चोरी होने के बाद एक बार फिर एक और कलाकृति कभी भी चोरी हो सकती है। स्कल्पचर्स में सबसे आगे लगी नर्तकी की कलाकृति कभी भी चोरी हो सकती है। नर्तकी की कलाकृर्ति को खड़ा रखने के लिए लोहे के एंगल का आधार पूरी तरह से तोड़ दिया गया है। हालात यह है कि वर्तमान में मूर्ति केवल कुछ पत्थरों के सहारे टिकी हुई है ऐसे में चोर कब आकर इसे ले जाएंगे कोई जानने वाला नहीं है। सुरक्षा के नाम पर तैनात गाडर््स को भी सोने से फुर्सत नहीं है वहीं जेडीए उनके भरोसे बैठा चैन की नींद सो रहा है।
शहर के सौंदर्यन को लेकर रामबाग चौराहा, बजाज नगर और टोंक रोड पर विभिन्न मुद्राओं में कलाकृति लगवाई गई थी। अष्टधातु की बनी इन महंगी मूर्तियों के चोरी होने का सिलसिला शुरू से ही चल रहा है। रामबाग से सवार्धिक दो मूर्तियां चोरी हो चुकी है। इसके बावजूद जयपुर विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने सुरक्षा को लेकर कोई खास इंतजाम नहीं किए। डीबी स्टार को एक जागरूक नागरिक ने रामबाग चौराहे पर लगी एक कलाकृति चोरी होने का अंदेशा इस बात को लेकर जताया कि नर्तकी की कलाकृति केवल पत्थरों के सहारे टिकी हुई है, जबकि अन्य कलाकृति लोहे के एंगल से जुड़ी हुई है डीबी स्टार टीम ने माका देखा तो नजर आया कि स्कल्पचर्स सभी लोहे के एंगलों से जुड़े हुए है। सबसे आगे लगी नर्तकी की कलाकृति पत्थरों के सहारे खड़ी है। उसे थोड़ा सा हिलाया तो वह नीचे गिरने लगी। ऐसे में कलाकृति के चोरी करने के तरीके का आभास जरूर हो गया।
जानकारों ने बताया कि चोर लोहे के एंगल को धीरे-धीरे तोड़ते है और मूति को पत्थरों के सहारे खड़ा कर देते है। जब किसी को कोई संदेह नहीं होता तब मौका देख कलाकृति को उठा ले जाते है। चोर कलाकृतियों के उठा ले जाने का समय भी ऐसा रखते है कि भीड़ भी कम हो और सुरक्षा गार्ड को भी झपकी आती रहे। जब गार्ड की नींद खुलती हँै तो कलाकृति गायब नजर आती है।
जानकारी में सामने आया कि करीब अप्रैल, ०८ में लगी तीज की सवारी थीम बेस्ड कलाकृतियों में चोरों ने दो दफा हाथ आजमाए है। एक बार तो २४ जून, ०८ को चार कलाकृति व दूसरी बार ३१ दिसम्बर, ०८ को दो कलाकृति चोरी हो चुकी है। सुरक्षा एजेंसियों ने दोनो ही बार ज्योतिनगर थाने में चोरी का मामला दर्ज कराया।
मुकदमें में लगी एफआर
कलाकृति चोरी होने के दर्ज कुछ हाथ नहीं लगने के बाद सब इंस्पेक्टर एकता मीणा ने मामले में एफआर दे दी। मामले की जांच कर रही मीणा ने बताया कि जब मुल्जिम पकड़े जाएंगे तब केस खोलकर आगे की कार्रवाई को अंजाम दे दिया जाएगा।
और भी जगह यही हाल
बजाज नगर तिराहे पर लगी दो कलाकृतियां चोरी हो चुकी है। जबकि टोंक रोड आश्रम मार्ग पर दो दफा चोरी का प्रयास किया गया। एक प्रयास को तो करीब एक माह का समय ही हुआ है जब चोर कलाकृतियों को हिलाकर एंगल तोड़ रहे थे, तैनात गार्ड ने हल्ला मचा दिया।
जांच अधिकारी एकता मीणा से सवाल
रामबाग से कलाकृति चोरी के मामले में जांच कहां तक पहुंची?
उस मामले में तो कभी की एफआर लग चुकी है।
इतनी जल्दी एफआर देने का कारण?
जल्दी कहां, दो तीन महीने तलाश और जांच के बाद मामले में एफआर दी है। जांच में जब कुछ नहीं निकला तो कब तक उसे लेकर बैठे रहते ।
इसका मतलब जांच खत्म?
नहीं जब भी मुकदमे से संबंधित कुछ हाथ लगेगा तभी केस रिओपन हो जाएगा।
जांच किस आधार पर हुई?
मामला चोरी से जुड़ा है। जांच के लिए मूर्तिचोरों से पूछताछ की गई। कुछ जगहों पर मूर्तियां मिली, लेकिन वे चोर इस तरह की नहीं मंदिरों की मूर्तियां चुराते थे। इस कारण मामले में ज्यादा कुछ नहीं हाथ लगा।
जेडीए के एडिशनल चीफ इंजीनियर ललित शर्मा से सवाल
स्कल्पचर्स की सुरक्षा को लेकर क्या इंतजाम है?
२४ घंटें के लिए सुरक्षा गार्ड तैनात किए हुए है।
लेकिन वे तो सोते रहते है?
हमें क्या फर्ख पड़ता है। पहले की चोरी हुई कलाकृति की रिकवरी हमने सुरक्षा एजेंसी से की है।
तो क्या रिकवरी ही करते रहेंगे?
नहीं सुरक्षा को लेकर मार्च की रिव्यू बैठक में विचार किया गया थ। इसमें एसई को कलाकृतियों की सुरक्षा को लेकर प्रोजेक्ट बनाने को कहा गया है।
किस तरह का होगा प्रोजेक्ट?
ऐसा डिवाइस तैयार करने के लिए कहा गया है जिससे कलाकृतियों के हाथ लगाते ही अलार्म बज उठे। वैसे और भी संभावनाएं तलाशी जा रही है।

पानी हमारा, बिल जलदाय का

पिछले चार साल में महकमे ने कराया करीब दस लाख रुपए का बिल
गर्मी की दस्तक के साथ ही प्रदेश में पानी की किल्लत बढ़ती जा रही है। राजधानी में जहां कई इलाकों में बिल देने के बाद भी पीने लायक पानी मयस्सर नहीं हो रहा वहीं महकमे के जिम्मेदार अधिकारियों की मेहरबानी से विद्याधरनगर स्थित सहयोग अपार्टमेंट में रहने वाले परिवार मुफ्त में पानी का उपयोग कर रहे है। लापरवाही का आलम यह है कि करीब साढ़े तीन सौ परिवारों को यह सुविधा पिछले चार साल से मुहैया है।
विद्याधरनगर में राजस्थान को-ऑपरेटिव हाउसिंग विभाग ने सहयोग अपार्टमेंट का निर्माण किया था। कर्मचारियों के लिए
कार्मिक विभाग ने इसे खरीदा और कर्मचारियों को आवंटन किया। इस अपार्टमेट में रहने वाले ज्यादातर सरकारी कर्मचारी होने के नाते मुफ्त की सेवा से किनारा करना चाहते है, लेकिन जलदाय महकमा ही इस मामले में पिछड़ रहा है। यहां तक की अपार्टमेंट के एक टावर में रहने वाले लोगों ने तो २०० रुपए प्रतिमाह सोसायटी के लोगों को जमा भी करवा रहे है ताकि जब कभी जलदाय विभाग एक मुश्त रिकवरी करतें तो देने में परेशानी नहीं आए। इसके बावजूद मुख्य सचिवप तक मामला पहुंच गया लेकिन न तो जलदाय महकमा ही राहत पा सका और न ही रहने वाले कर्मचारी। अपार्टमेंट के बोरिंग को खराब होने के बाद यहीं रहने वाले जलदाय महकमे के अधिकारियों ने २००६ में नया बोरिंग खोद डाला। अपार्टमेंट में बोरिंग होने से जलदाय विभाग ने इनको कनेक्शन नहीं माना, लिहाजा पेयजल लेने वाले लोगों से कोई वसूली नहीं की गई। चार सालों में जलदाय महकमे ने दस लाख से ज्यादा का बिजली बिल का भुगतान भी किया है और कर रहा है। दिनरात चलने वाले इस बोरिंग का विद्युत खर्च करीब २० हजार रुपए महीना आता है। यहां जलदाय महकमे के एईएन अजयसिंह, जेईएन श्योदानसिंह, टाइमकीपर भुवनेश पारीक भी रहते है।
तत्कालीन एईएन अजयसिंह से सवाल
कितने परिवार अपार्टमेंट में रह रहे है?
अपार्टमेंट में दोनों टावरों को मिलाकर साढ़े तीन सौ फ्लैट है।
यहां चार साल से मुफ्त का पानी वितरित किया जा रहा है?
हां...बिल्कुल महकमे में इस बात की जानकारी सभी को है।
लेकिन आप तो विभागीय अधिकारी है और जब कनेक्शन हुआ तो संबंधित जोन में ही तैनात थे?
मैं तैनात था। दरअसल ये योजना सरकारी कर्मचारियों के लिए कार्मिक विभाग ने पर्चेज की थी। तत्कालीन मुख्य सचिव ने अपार्टमेंट में रहने वालों को पानी मुहैया कराने की जिम्मेदारी तय की थी, मैंने वहां बोरिंग करवा दिया।
लेकिन मुख्य सचिव ने बिलों के पैसे लेने के लिए थोड़े ही मना किया था?
नहीं दरअसल हुआ क्या कि जब सोसायटी के लोगों ने कनेक्शन की फाइल लगाई तो लेवी के चार्ज में करीब साढ़े चार लाख रुपए लगा दिए। इतनी रकम देखकर सोसायटी वाले बदल गए। इस बात की जानकारी मुख्य सचिव को मिली तो उन्होंने असिस्टेंट सेक्रेट्री जीएडी और राजस्थान को-ऑपरेटिव हाउसिंग के एमडी को कमेटी में शामिल कर इसका हल निकालने की जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन आज दिन तक कुछ नहीं हुआ।
अपार्टमेंट निवासी मुकेश मुदगल
आप लोग सरकारी पानी मुफ्त में पी रहे है?
बिल्कुल ...जलदाय महकमे की मेहरबानी है।
आप लोगों को नहीं लगता कि आप गलत कर रहे है?
क्या करे? कई दफा हमने पीएचईडी को इस बारे में बताया भी लेकिन उन्होंने भी अपना हाथ खड़ा कर दिया। ऐसे में हम भी परेशान है।
मुफ्त में पानी मिल रहा है, आपको क्या परेशानी?
हम तो सरकारी कर्मचारी है। कभी विभाग से एरियर आ गया तो परेशानी हो जाएगी इसलिए परेशान है।
तो आपने अधिकारियों से क्यों नहीं संपर्क किया?
हमने तो जलदाय विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया था तो उन्होंने जवाब दिया कि हम अपार्टमंट में मेंटिनेंस नहीं कर सकते इसलिए पैसा भी नहीं वसूल सकते है। उसके बाद हम प्रिंसिपल सेक्रेट्री से मिले थे उन्होंने सात दिन में अधीक्षण अभियंता को सात दिन में रिपोर्ट देने के लिए निर्देश दिए थे, लेकिन लीपापोती के अलावा कुछ नहीं हुआ।
अधीक्षण अभियंता बी.कृष्णन से सवाल
सहयोग अपार्टमेंट में विभाग बिल की राशि क्यों नहीं वसूल रहा?
इस मसले पर जानकारी मुख्य सचिव स्तर पर है।
विभाग क्यों नहीं कार्रवाई कर रहा है?
मुख्य सचिव ने इस मसले पर वस्तुस्थिति की रिपोर्ट मांगी थी। हमने रिपोर्ट भेज रखी है।
कुछ कार्रवाई के निर्देश मिले?
नहीं अभी तो कोई निर्देश नहीं मिले। जैसा आदेश होगा कार्रवाई कर देंगे।

महल ले लो या पहाड़

एके कोठारी - एडिशनल डाइरेक्टर माइनिंग जयपुर जोन से सवाल
अवैध खनन को रोकने के लिए हाल ही में सरकार ने विभागीय बैठक के बाद घोषणा की। घोषणा में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सेटेलाइट से खनन पर नजर रखने और रोकने के लिए टॉस्क फोर्स बनाने की जानकारी भी दी। विभागीय सचिव गोविन्द शर्मा ने बताया कि योजना में करीब सात करोड़ रुपए खर्च होंगे। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि करोड़ों रुपए खर्चने के बाद भी क्या अवैध खनन रुक पाएगा। जब तक महीने की पगार पाने वाले लोग अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे तब तक आंखों के सामने होने वाले इस अवैध खनन को सेटेलाइट और टॉस्क फोर्स तो क्या कोई भी नहीं रोक पाएगा।
सरकार ने अवैध खनन को रोकने के लिए नई योजना की घोषणा की है उससे आपको क्या फायदा होगा?
इससे हमें तो कोई फायदा नहीं होगा। हां ...हमें भी जानकारी मिल जाएगी कि कहां क्या चल रहा है।
फिर इस योजना की जरूरत क्यों पड़ी?
दरअसल मामला अलवर से जुड़ा है।
केवल अलवर के लिए ही?
हां...अरावली में अवैध खनन की लगातार शिकायत बढ़ रही थी। मामला वन विभाग से भी जुड़ा हुआ है।
इससे क्या फायदा होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली का स्टेटस जानने के लिए सरकार से जानकारी देने व समझाने के लिए कहा था। चूंकि अवैध खनन के कारण मौके पर तेजी से बदलाव हो रहा है इसलिए सरकार ने सेटेलाइट से फोटोज लाने के लिए कहा था।
इसको कौन संभालेगा?
माइनिंग की तो बस की बात नहीं है। जानकारी में आया कि साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंंट को यह जिम्मेदारी सोंपी है।
सेटेलाइट से अवैध खनन पर कैसे पार पाएंगे?
इससे कोई अवैध खनन थोड़े ही रुकेगा। ये तो सुप्रीम कोर्ट को अरावली का स्टेटस दिखाने और सरकार की आगे की प्लानिंग के लिए है।
जयपुर में क्या अवैध खनन नहीं हो रहा?
ज्यादातर माइंस तो हमने ही ठेके पर या लीज पर दे रखी है। अवैध खनन की मुझे जानकारी नहीं है।
सेटेलाइट से आपको भी तो सुविधा हो जाएगी?
काहे की सुविधा? सेटेलाइट से तो तीन महीने पुराने पिक्चर आएंगे। उन्हें भी बैंगलोर से खरीदना पड़ेगा।
फिर टॉस्क फोर्स भी तो बन रही है?
उसका भी ज्यादातर इलाका अलवर ही होगा, हमें तो पुलिस के भरोसे ही काम करना पड़ता दिख रहा है।
लेकिन आपकी भी तो विजिलेंस विंग है?
काहे की विंग करीब-करीब सारे पद तो खाली पड़े है।
उनको भरने के लिए आपने अधिकारियों को नहीं लिखा?
ये जानकारी तो सबको है। जब तक सरकार नहीं चाहे कुछ नहीं हो सकता।
आपने ज्यादातर माइंस लीज पर दे रखी है, फिर तो पहाड़ किताबों में ही रह जाएंगे?
इस बारे में तो सभी एक पक्ष से सोचना पड़ेगा। क्योंकि माइनिंग भी पब्लिक की जरूरतों के पीछे ही हो रही है।
लेकिन आपकी जिम्मेदारी नहीं है इनको बचाना?
या तो महल ही बना लो या पहाड़ ही सहेज लो। दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते।
लेकिन जो सामने ही अवैध खनन हो रहे है उनको भी क्या सैटेलाइट से ही रोकोगे?
नहीं ऐसा बहुत कम हो रहा होगा, इस बारे में इलाकाई इंजीनियर्स ही कुछ बता सकते है।
आप लोगों की जिम्मेदारी नहीं बनती की अवैध खनन को रोकें?
हमारे पास इसको रोकथाम वाली विंग की पोस्टें खाली पड़ी है।
तो क्या देखते रहोगे?
नहीं तो ऐसी जो हो सकता है कार्रवाई करेंगे। अब तो सरकार इसके लिए टॉस्क फोर्स बना रही है।

Sunday, March 21, 2010

लापरवाही का खेल, सुरक्षा फेल

सामुदायिक केन्द्र की छत से हवाई अड्डे में मारी जा सकती है सेंध
देश में लगातार हो रही आतंकी घटनाओं के बाद भी जयपुर एयरपोर्ट की सुरक्षा भगवान भरोसे है। जब भी कहीं आतंकी हमला होने सूचना मिलती है तो एयरपोर्ट के प्रवेश द्वार पर जरूर सुरक्षा के कुछ इंतजाम दिखाए जाने की पहल होती है, लेकिन एक जागरूक पाठक ने डीबी स्टार को रास्ते की जानकारी दी जो सुरक्षा के लिहाज से कतई उचित नहीं है। सुरक्षा का दावा करने वाले विमानपत्तन प्राधिकरण के अधिकारी को तो इसकी जानकारी ही नहीं है। जो कैमरे और सुरक्षाबलों तैनात किए है उनकी भी निगाहों से दूर है यह जगह। विमानों के रन-वे में बैकडोर एंट्री की ये सुविधा शहर की जिम्मेदारी संभालने वाली नगर निगम ने ही मुहैया कराई है। डीबी स्टार टीम ने मौके पर जाकर देखा कि आतंकी तत्त्वों के लिए घटना को अंजाम देना यहां से कितना आसान है।
नागरिक नगर के साथ ही शंाति नगर बसी हुई है। ज्यादातर मकान एयरपोर्ट की दीवार से कुछ ही दूरी पर बने है, जमीन को कब्जाने की नीयत से सभी मकान मालिकों ने एयरपोट्र की दीवार तक अपना अधिकार जमा रखा है। दीवार के सहारे कुछ जगहों पर पड़े मलबे से अंदाजा हो जाता है कि कभी कार्रवाई जरूर हुई होगी। एक जगह एयारपोर्ट से सटी गुलाबी रंग में बनी इमारत बाहर लिखा था सामुदायिक केन्द्र। दरवाजे खुले पड़े थे, सीढिय़ों से इमारत के छत पर जाने की सुविधा थी। न कोई रोकने वाला था और न कोई टोकने वाले। आसानी से छत पर गए छत से एक छलांग दूरी पर एयरपोर्ट। शंाति नगर से पिछले कई समय से मकानों को हटाने की कवायद हो रही थी। एयरपोर्ट अथॉरिटी का कहना था कि सुरक्षा के लिहाज से मकानों को हटाना ही होगा, उधर नगर निगम ने सुरक्षा दरकिनार कर करीब तीन साल पहले एक सामुदायिक केन्द्र का निर्माण कर दिया। नगर निगम के एक जिम्मेदार अधिकारी का कहना है कि नगर निगम तो वहां ये सुविधा नहीं बनाना चाहता था, लेकिन स्थानीय विधायक कालीचरण सराफ ने अपने कोटे से करीब दस लाख रुपए देकर एयरपोर्ट की दीवार से सटी करीब पांच सौ वर्ग गज जमीन पर सामुदायिक भवन बनाने को मंजूरी दी थी। इस भवन निर्माण के दौरान कांग्रेस की तत्कालीन पार्षद डॉ.अर्चना शर्मा ने विरोध जताया था। पार्षद का विरोध था कि थोड़ी बहुत जमीन पर बनने वाले इस कम्यूनिटी हॉल का कोई उपयोग नहीं हो सकेगा। उसके बावजूद नगर निगम ने सुरक्षा को भेदने वाली इमारत का निर्माण कर दिया।
जिम्मेदार सोते रहे
उधर, विमानपत्तन प्राधिकरण की ओर से सुरक्षा को लेकर सरकार में कई पत्राचार होने के बावजूद इस मसले पर प्राधिकरण ने कोई आपत्ति नहीं जताई। चैन की नींद सोने वाले प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते इस इमारत को बनने से नहीं रोका। यहां तक की सुरक्षा का दावा करने वाले एयरपोर्ट के निदेशक तो एयरपोर्ट से सटी ऐसी किसी भी इमारत के बने होने से अनजान है।
एयरपोर्ट निदेशक अनुज अग्रवाल से सवाल
एयरपोर्ट की दीवार से सटे इमारतों से सुरक्षा को खतरा नहीं है?
नहीं...एयरपोर्ट की चारदीवारी काफी उंची है। इससे मकानों को कोई खतरा नहीं है।
लेकिन नगर निगम के बनाए गए कम्यूनिटी हॉल की छत तो एयरपोर्ट की दीवार के बराबर है?
इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है।
सुरक्षा को लेकर पिछले तीन साल में कई दफा काफी हो हल्ला मचा और आपको इस बारे में कोई जानकारी नहीं है?
फिलहाल आऊट ऑफ स्टेशन हूं। इस बारे में कल बात करेंगे।
...एयरपोर्ट की दीवार की ऊंचाई कितनी होगी और सुरक्षा को लेकर क्या इंतजाम है?
एयरपोर्ट की दीवार १० फीट ऊंची है और बाकी जानकारी कल ही दे सकता हूं।
ऐसा कहकर उन्होंने फोन काट दिया
नगर निगम के मुख्य अभियंता डीएल भाखर से सवाल
सामुदायिक केन्द्र एयरपोर्ट की दीवार से सटाकर क्यों बनाया गया?
इसकी मुझे जानकारी नहीं है। मेरे नगर निगम में आने से पहले ये बन गया था।
लेकिेन क्या ये पैसों का दुरूपयोग नहीं है?
ये तो सुरक्षा के लिहाज से भी सही नहीं है। इसकी पूरी जानकारी संबंधित जोन एक्सईएन ही बता सकते है।

Wednesday, March 10, 2010

सरकार ने भी अपना पल्ला झाड़ा

गंदे नालों के पानी से उगाई सब्जियों से लोगों की सेहत भले ही बिगड़ रही हो, लेकिन प्रशासन की तरह ही सरकार को इससे कोई सरोकार नहीं है। दुख दर्द को बांटने की दुहाई देने वाले नुमांइदे भी इस जिम्मेदारी से पल्ला झाडऩे में लगे है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या ऐसे ही लोग जहरीली पैदावार से होने वाली बीमारियों से दम तोड़ते रहेंगे। डीबी स्टार टीम ने गंदे नालों से पैदा होने वाली फसलों से फैलती बीमारियों और जिम्मेदार लोगों द्वारा एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने की आदत को उजागर किया था। जब इस बारे में चुने गए और जिम्मेदार पदों पर बैठे मंत्रियों से बात की गई तो उन्होंने भी इस को दूसरे विभागों पर टालना उचित समझा। संवेदनशील मसले पर प्रशासन के टालू रवैए से परेशान कुछ लोगों ने अपनी और से कदम उठाना शुरू किया है। राष्ट्रीय सेवाकर्मी जितेन्द्र शर्मा ने बताया कि लाखों रुपए का वेतन और सुख सुविधा इन अधिकारियों को आखिर क्यों कर दी जा रही है, जब उन्हें ही अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है तो। उधर, नागरिक अब्दूल हफीज ने बताया कि गैर जिम्मेदार लोगों पर वे तो कानूनी कार्रवाई करने की तैयारी कर रहे है।
कृषि मंत्री हरजीराम बुरड़क
खेतों में जहरीली पैदावार हो रही है, इसको रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?
इस मसले पर तो मैं भी दुखी हूं। इस मामले में उद्योग विभाग को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। कानून होने के बाद भी फैक्ट्री संचालक पानी को साफ कर नालों में नहीं छोड़ रहे है।
कैसा कानून?
ज्यादा तो मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन सुना है कि गंदे पानी को सार्वजनिक नहीं छोड़ा जा सकता।
आप तो सरकार है, फिर क्यों नहीं कानून की पालना करवाते?
कृषि विभाग को तो सलाह देने का काम है, किसी को पाबन्द करने का नहीं है। वैसे इसकी जिम्मेदारी तो पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की भी बनती है।
लेकिन वे भी तो जिम्मेदारी होने की मनाही कर रहे है?
बोर्ड में मुखिया पद पर आईएएस को लगा रखा है, उनका काम ही यही है अब वे मना कर रहे है तो कोई क्या कर सकता है।
स्वास्थ्य मंत्री एमादुद्दीन खां
गंदे नालों से उगी सब्जियों से लोगों की सेहत पर खिलवाड़ हो रहा है?
मैं तो चुनावों की जिम्मेदारी से हाल ही मुक्त हुआ हूं। मुझे जानकारी नहीं की क्या बाजार में क्या खबरें है।
लेकिन गंदे नालों से पैदावार हो रही है ये तो जानकारी होगी ही?
हां...पहले जलमहल के आसपास खेती होती थी, लेकिन लोगों ने विरोध किया तो उसे बंद करवा दिया। अब कहां खेती होती है मुझे कोई जानकारी नहीं है।
लोगों की सेहत बिगड़ रही है आपको जानकारी नहीं?
चुनाव निबटाकर आ रहा हूं, मामले की जानकारी करवाता हूं।

जहरीली पैदावार का कौन जिम्मेदार

जेके लॉन में बच्चे के पेट का ऑपरेशन कर सैंकड़ों कीड़े निकाले गए, चिकित्सकों ने इस तरह के पेट में कीड़े होने का गंदे नालों से उगी पैदावार को अहम कारण बताया। बच्चे के पेट में कीड़े कोई पहला मामला नहीं है, ज्यादातर लोग इस तरह की बीमारी के शिकार हो रहे है। उसका कारण भी साफ है। शहर के बाहरी इलाकों में गंदे पानी के नालों में बहने वाले पानी का उपयोग सब्जियां उगाहने में कर रहे है। चिकित्सक लोगों को ऐसी सब्जियों से परहेज करने की जानकारी व दवाईयां देकर अपना पल्ला झाड़ लेते है। कई दफा विभिन्न इलाकों में दूषित पानी से होने वाली पैदावार की जानकारी भी प्रकाशित हुई, लेकिन जिम्मेदार लोग एक दूसरे पर जिम्मेदारी का ठीकरा फोड़ अपना दामन बचाने में जुटें रहे। किसी ने भी आगे बढ़कर इस जहरीली पैदावार रोकने को अपनी जिम्मेदारी नहीं माना। नतीजा कुछ हो हल्ला मचने के सिवाय बीमारी की इस पैदावार पर कोई असर नहीं पड़ा। एक बार फिर बच्चे के पेट में कीड़ें की खबर आई तो सवाल खड़ा हुआ कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? डीबी स्टार ने पैदा करने वाले किसानों से लेकर लगभग उन सभी विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों से पड़ताल की तो सामने आया कि एक दूसरे पर तो सब आरोप लगा रहे है, लेकिन जिम्मेदारी उठाने को कोई तैयार नहीं है। किसान वर्ग जहां साफ पानी नहीं होने पर नालों के पानी को काम में लेने की बात कहते है तो प्रशासन इसे पुलिस थाने का मामला बता रहा है। अपना हलक बचाने के लिए ठोस तर्क देने से भी नहीं चूक रहे।
कुलदीप रांका कलेक्टर से सवाल
गंदे नालें के पानी से सब्जियां पैदा की जा रही है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
निजी क्षेत्र में इस तरह की पैदावार होती है। इसके लिए तो थाने में एफआईआर ही दर्ज होती है।
तो ये एफआईआर कौन दर्ज कराएगा?
कोई भी करा सकता है, जिसको इसकी प्रॉब्लम हो।
क्या गंदे नालों से उगी सब्जियों पर रोक लगाने में सरकार और प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
एक बार मामले की इसकी जांच कराने के बाद ही कुछ बता सकता हूं।
शहर के बाहरी क्षेत्रों में गंद नालों के पानी से सब्जियां उगाई जा रही है, आपको जानकारी नहीं है क्या?
देखिए एक बार में इसकी जानकारी ले लूं, उसके बाद ही इस बारे में कुछ कह पाऊंगा।
के.बी. शर्मा, संयुक्त निदेशक मुख्यालय हॉर्टिकल्चर
गंदे नालों से उगाई सब्जियों पर पाबंदी नहीं लगाने के पीछे कौन जिम्मेदार है?
इसके लिए जेडीए जिम्मेदार है, क्योंकि जहां गंदे नालों से सब्जियां पैदा हो रही है वो इलाका जेडीए रीजन में आता है। थोड़ा रुककर ...आप ऐसा करें ज्यादा जानकारी के लिए डिप्टी डाइरेक्टर से सम्पर्क करें, मैं तो हाल ही में आया हूं।
सीताराम जाट, डिप्टी डाइरेक्टर, हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट
गंदे नालों से उगाई सब्जियों पर पाबंदी आपका विभाग क्यों नहीं लगा रहा?
कार्रवाई करने के हमारे पास कोई अधिकार ही नहीं है।
लेकिन ये तो आपके विभाग का ही काम है?
हमारे पास तो प्रमोशन का काम है, इंस्पेक्टरी और रेगूलेटरी पावर हमारे पास नहीं है।
आपको जानकारी होगी की ये पावर किसके पास है?
नहीं इस बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है।
बीएल बजाज, सीएमएचओ, जयपुर प्रथम से सवाल
दूषित पानी से सब्जियों की पैदावार रोकने के लिए कौन जिम्मेदार है?
इसकी जानकारी हमें नहीं है, हां...इतना जरूर पता है कि कम से कम स्वास्थ्य विभाग जिम्मेदार नहीं है। क्यों आपकी जिम्मेदारी क्यों नहीं है?
हमारा काम तो आने वाले मरीजों के सेहत सुधारना है। वैसे दूषित पानी का मसला है तो पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की जिम्मेवारी बनती है। उसे इस बारे में सोचना चाहिए।
वीएस सिंह, चैयरमेन, स्टेट पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से सवाल
दूषित पानी से सब्जियों की पैदावार रोकने के लिए कौन जिम्मेदार है?
जाहिर है कि प्रशासन ही जिम्मेदार होगा।
प्रशासन क्यों जिम्मेदार है?
यदि पानी किसानों को साफ मिलेगा तो वे गंदा पानी क्यों यूज करेंगे। साफ पानी उपलब्ध करवाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
फिर आपकी क्या जिम्मेवारी है?
हमारा काम तो क्षेत्र में वातावरण में फैली दूषित मात्रा की जानकारी एकत्र कर प्रशासन को देना है। वातावरण के प्रदूषण की मात्रा को कब और कैसे कम करना है इस बारे में तो प्रशासन को तय करना है।