Sunday, May 2, 2010

बचा लो मुझे... मैं पानी हूं

हां मेरा नाम पानी है।
मेरे अतीत की एक कहानी है।।
मेरे पिता कहते है, वंश हमारा सुसुप्त होने जा रहा है।
हंसता-खेलता कुनबा लुप्त होने जा रहा है।।
आपके जुल्मों से मैं बहुत छला गया।
इसलिए सबसे पहले आंखों से चला गया।।
क्योंकि आपने किया है मेरा दुरूपयोग, बरबादी।
आज की पोजीशन आप स्वयं ने ला दी।।
कभी मेरा सम्मान था।
इस बात पर मुझे गुमान था।।
मैं कुएं से निकाला जाता था।
तब मैं नीचाई से ऊंचाई की ओर आता था।।
मटकों में डालने के लिए मेरा सिर ऊंचा किया जाता था।
तब मैं फूला नहीं समाता था।।
नई नवेलियों के सिर पर मटकों में झूल जाता था।
गर्व से मेरा सीना फूल जाता था।।
लोग मुझे लोटा गिलास में सम्मान से सजाते थे।
मेरी कद्र करते थे, व्यर्थ नहीं बहाते थे।।
तब मैंने कभी अभाव का रोना नहीं रोया।
अपना आपा कभी नहीं खोया।।
पहले में बहुत था, आपकी आस था।
आपसे दूर नहीं, बल्कि आपके पास था।।
लोग अनायास ही मेरा सपना पाल लेते थे।
दस बीस फीट खोदकर मुझे निकाल लेते थे।।
क्योंकि तब आप मेरा सम्मान करते थे, व्यर्थ नहीं बहाते थे।
लोटा गिलास में सजाते थे, कम से ही काम चलाते थे।।
समय ने करवट बदला, मुझे व्यवस्था ने जकड़ा।
मेरा पथ टेकी, पाइप और टूंटी ने पकड़ा।।
अब मैं टंकी की ऊंचाई से नीचाई पर लाया गया।
मैं अपमानित हुआ, मुझ पर जुल्म ढ़हाया गया।।
पाइप के लीकेज मुंह चिढ़ाने लगे।
मुझे अनावश्यक ही बहाने लगे।
टूटी टंूटियों से यूं ही बहता रहा।
अपनी दर्द भरी कहानी कहता रहा।।
पाइप के लीकेज से सड़क पर सागर बन गया।
वक्त के थपेड़ों से सरिता से गागर बन गया।।
सभी को बता देना, मैं पानी हूं।
गुजरे वक्त की एक कहानी हूं।।
मुझे बूंद-बूंद बचाना तुम्हारे काम आऊंगा।
नहीं तो तुमसे दूर-बहुत दूर चला जाऊंगा।।
मुझे पाने के लिए आपकी आंखें बरसेंगी।
पानी-पानी कहकर आपकी पीढियां तरसेंगी।।
साभार- अब्दुल अय्यूब गौरी, जयपुर

वोल्वो नहीं डीलक्स प्लीज...

रोडवेज बसों को खत्म कर रहा अपने बेड़े से
आम आदमी की यात्रा हुई महंगी
निजी बसों को फायदा पहुंचाने के लिए राजस्थान रोडवेज ने डीलक्स बसों की खरीद बंद कर दी है। ये हम नहीं कह रहे बल्कि रोडवेज के ही आंकड़े इस बात का खुलासा कर रहे है। आंकड़ों से साफ है कि पिछले दो साल में करीब १८०० बसों की खरीद के लिए अनुमति मिलने के बाद भी रोडवेज प्रशासन ने एक भी डीलक्स बस नहीं खरीदी।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बजट वर्ष २००७-०८ से पूर्व रोडवेज प्रशासन करीब ५० डीलक्स बसों की सालाना खरीद करता था। जिससे यात्रियों को खटारा और पुरानी बसों की जगह नई बसों की सुविधा मिल सके। वर्ष २००७-०८ में राज्य सरकार से अनुमति मिलने के कारण किसी भी श्रेणी की बस नहीं खरीदी गई। इसके बाद रोडवेज को वर्ष २००८-०९ में राज्य सरकार ने ११५० बसों को खरीद करने की अनुमति मिली, इन बसों में ५० बसें डीलक्स व एसी बनवाई जानी थी, लेकिन रोडवेज प्रशासन ने इस और बेरुखी अपनाई। रोडवेज ने स्वीकृत की गई ११५० बसें एक्सप्रेस कैटेगरी की तैयार करवा ली। चालू सत्र में भी सरकार ने रोडवेज को ६५० बसें खरीदने को हरी झंडी दे दी, लेकिन रोडवेज इस बार भी डीलक्स और एसी बसें खरीदने में रूचि नहीं दिखा रहा हैं।
किराए का अंतर --जयपुर से दिल्ली का किराया डीलक्स - ३०० रुपए, एसी - ४०० रुपए व वोल्वो -५५० रुपए है। डीलक्स बसें नहीं होने से मध्यम वर्गीय लोगों के लिए सस्ती यात्रा का विकल्प समाप्त हो गया, जिसका फायदा निजी बस ऑपरेटर्स उठा रहे है। डीलक्स बसों का रूट जयपुर-कोटा, जयपुर-जोधपुर, जयपुर- आगरा ही रहता था। यही कारण है कि पिछले सालों में हाइवे पर दौडऩे वाली रोडवेज की डीलक्स बसों की संख्या मात्र २ रह गई है। जबकि पिछले कुछ साल पहले इनकी संख्या १६ से १८ हुआ करती थी। निजी बस ऑपरेटर्स रोडवेज से कम्पीटिशन के फेर में अपनी रेट्स कम रखते थे, लेकिन जब सरकारी एजेंसी ही फेल हो गई तो उन्होंने भी मनमानी दरें बढ़ाकर मध्यमवर्गीय लोगोंं की जेब पर वजन डाल दिया।
यह है तकनीकी कारण
डीलक्स बसें ५ किलोमीटर चलने के बाद तकनीकी तौर पर सेमी डीलक्स किराए पर संचालित होती है, क्योंकि बसों का स्तर डीलक्स के मुताबिक नहीं रहता। ऐसे में रोडवेज ८० फीसदी से ज्यादा डीलक्स बसों को सेमी डीलक्स बसों के किराए पर ही संचालित कर रहा है। जिम्मेदारी से बचने के लिए डीलक्स जोन के मैनेजर ने दिल्ली व आगरा हाइवे को छोड़कर दूसरे मार्गो पर चलने वाली डीलक्स बसों को अन्य आगारों में ट्रांसफर कर दिया। रोडवेज प्रशासन एसी व वोल्वों बसों पर ही ध्यान दे रहे है जबकि मध्यम श्रेणी के यात्रियों को रोडवेज प्रशासन के कारण महंगी यात्रा करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

सीएमओ से गायब होती हैं पत्रावलियां!

मुख्य सूचना आयुक्त ने दिया आदेश जांच कर तय करें जिम्मेदारी
मुख्यमंत्री कार्यालय से कभी भी कोई जरूरी दस्तावेज गायब हो सकते है। प्रदेशवासियों की ओर से मुख्यमंत्री को भेजे जाने वाले ज्ञापन और शिकायती पत्रों को संभालने की जिम्मेदारी भी तय नहीं है। ये हम नहीं कह रहे बल्कि मुख्य सूचना आयुक्त की ओर से हाल ही जारी एक आदेश का आशय तो यही निकलता है। आदेश में साफ लिखा है कि सबूतों के आधार पर तो प्रार्थी केे पत्र सचिवालय को भेजे गए है, जबकि जवाब में किसी भी तरह का कोई भी ज्ञापन फैक्स, स्पीड पोस्ट मिलने से इनकार कर दिया।
जानकारी के अनुसार स्वेज फार्म संयुक्त महासंघ के अध्यक्ष संजय शर्मा ने २६ अप्रैल २००८ को स्पीड पोस्ट के जरिए ८८ पेजों का एक शिकायत पत्र भेजा था। पत्र में तीन आवासीय योजनाओं में कुछ प्रशासनिक अधिकारियों पर मिलीभगत कर पद के दुरूपयोग की शिकायत की थी। उसके बाद महासंघ के प्रतिनिधि मंडल ने ४ अगस्त, ०८ मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिव को ज्ञापन सौंपा गया। शर्मा ने १५ दिसम्बर, ०८ को सीएमओ में फैक्स कर अपनी शिकायत दर्ज कराई। लंबे अंतराल के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होते देख शर्मा ने मार्च, ०९ को सूचना के अधिकार में मुख्यमंत्री कार्यालय से तीनों शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई इसकी जानकारी मांगी। जब निर्धारित अवधि में सूचना नहीं दी गई तो प्रथम अपील अधिकारी के सामने अपील की, वहां भी कोई जवाब सीएमओ से नहीं आया। उसके बाद शर्मा ने मुख्य सूचना आयुक्त के सामने अपील की। सूचना आयोग की ओर से भेजे गए नोटिस का मुख्यमंत्री कार्यालय ने जवाब दिया कि विभिन्न तरीकों से भेजे गए तीनों ही पत्र प्राप्त नहीं हुए है। सुनवाई में शर्मा ने फैक्स और स्पीड पोस्ट की रसीदें दिखाई।
उपस्थित ही नहीं
सूचना के अधिकार के प्रति मुख्यमंत्री भले ही सम्मान करते हो, लेकिन उनके कार्यालय में तैनात अधिकारियों को ऐसा नहीं लगता। यही कारण है कि आयोग की सुनवाई में मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से पक्ष रखने के लिए कोई उपस्थित नहीं था। जानकारों का कहना है कि जब जिम्मेदार लोग ही कानून की इस तरह से अवहेलना करेंगे तो और सरकारी विभागों से क्या अपेक्षा की जा सकती है।
ये दिया आदेश
आयोग के अध्यक्ष एमडी कौरानी ने नरम रूख अपनाते हुए लिखा कि मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारी जांच करवाए कि उनके कार्यालय में पत्र मिलने के बाद भी उपलब्ध क्यों नहीं हो रहा है। जिस रजिस्टर्ड पत्र का संदर्भ दिया गया है वह पार्सल उनके कार्यालय में प्राप्त हुआ था या नहीं। यदि नहीं हुआ तो समस्त पत्रादि कहां गए। यह जांच कर उत्तरदायित्व निर्धारित करते हुए अग्रिम कार्यवाही करवाई जाए।

Saturday, April 24, 2010

देह व्यापार की जकड़ में राजधानी

सच्ची कहानी जो एक लड़की की जिंदगी में काला सच बनकर आई
शहर में बढ़ती वारदातों की तह में जाने पर निकली सच्चाई
मैं राजधानी के एक इलाके में मध्यम वर्र्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हूं। खूबसूरत होने के साथ ही यौवन की दहलीज पर भी पैर रख दिया था। यही कारण था कि परिवार आर्थिक स्तर कमजोर होने से छोटी-छोटी चीजों के लिए उन पर निर्भरता समाप्त करने की इच्छा रहती थी। लड़कियों की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर अपनी गिद्ध जैसी नजरें गढाए जानवर सरीखे लोग मौके की तलाश में बैठे रहते है। पलभर की चुप्पी जीवनभर को आंसुओं में डुबाने के लिए काफी होते है। ऐसे ही एक गिरोह की गिरफ्त में आने के बाद उनके बाद अपने आप को आजाद मानकर सादा जीवन जीनें की आस जगाई थी, लेकिन आए दिन अनजाने लोगों के फोन आने और परेशान करने पर मैं टूट चुकी हूं। कभी आत्महत्या करने का विचार आता है तो परिवार के लोगों को देख हिम्मत जवाब दे जाती है। चेहरे पर आने वाली हलकी सी हंसी पता नहीं उन लोगों को क्यों बुरी लगती है कि किसी न किसी तरीके से अतीत सामने ला देते है। उसी अतीत को सबके बीच शेयर करके मैं सहानुभूति नहीं बटोरना चाहती, मैं तो चाहती हूं कि वे लड़कियां जो अपने परिवार का सहारा बनना चाहती है बाजार में बैठे भूखे दरिंदों को पहचाने और उनके हाथों मेंं अपने आप को झूलने नहीं दे। मैं जालिमों को सजा देने जैसी बात पुलिस महकमे से इसलिए नहीं कहूंगी कि ज्यादातर काम उन्हीं की सरपरस्ती में होते है। अपनों पर जुल्म से छुटकारा पाने के लिए जब मीडिया को सहारा माना तो कड़वी सच्चाई ये निकलकर आई कि बगैर किसी सबूत के कुछ भी कर पाने में वे भी अपंग है। अपने शरीर को खिलौना बनने से पहले बचकर मैंने शायद गलती की। या उन शैतानों के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत क्यों कर रही हूं। ऐसे सवाल है जो मेरे जेहन में टनों वजनी पत्थर के माफिक लगते है।
मैं पूनम (बदला हुआ नाम)अपनी जिंदगी के कड़वे सच के बारे मेंं कुछ बताना चाहती हूं। जो कुछ मेरे साथ हुआ वो किसी और के साथ न हो। किसी के विश्वास को कोई हवस का शिकार बना दें तो दुबारा वो किसी पर चाहकर भी विश्वास नहीं कर पाती। मेरे साथ भी एक ऐसा ही हादसा हुआ है जिसके बाद मेरा किसी पर विश्वास करना मुश्किल हो गया।
कॉलेज में पढ़ते समय मैंने एक फेयर में जॉब प्लेसमेंट की सर्विस ली। उस फेयर के कुछ दिनों बाद मेरे पास जॉब के लिए फोन से ऑफर आया। फोन पर बात की तो एक शख्स बोला जिसने अपना नाम सन्नी बताया और बोला कि मैं मॉडलिंग करता हूं। जब मैंने उससे अपना नाम और नंबर की जानकारी देने की बात पूछी तो उसने बताया कि आपने जो फेयर में जॉब सर्विस के लिए अप्लाई किया था वहीं से जानकारी मिली है। मैंने सन्नी से फोन करने का कारण पूछा तो उसने बताया कि हम लोग शहर में एक ऑफिस खोल रहे है। जिसकी ऑपनिंग हो चुकी है। उसके लिए रिसेप्शन पर एक खूबसूरत लड़की चाहिए, आप जॉब करना चाहती है तो इंटरव्यू देने आ सकती है। मैंने इस बारे में सोच कर बता दूंगी कहा और फोन काट दिया। उसके बाद करीब-करीब रोजाना ही फोन आने लगा और एक बार इंटरव्यू देकर जॉब देख लेने के लिए समझाने लगा। आखिरकार मेंने इंटरव्यू के लिए उससे एड्रेस पूछा तो उसने जो बताया वो मुझे समझ नहीं आया। उसने मुझे कंवेंस करते हुए पोलो विक्ट्री पहुंचने के लिए कहा। उसने बताया कि वहीं से एक लड़की और इंटरव्यू के लिए आ रही हैं। दोनों को लेने के लिए मैं अपने स्टाफर्स को भेज दूंगा।
फोन बात करने के हिसाब से मैं पोलो विक्ट्री तिराहे पर पहुंच गई। करीब १५ मिनिट बाद एक लंबी सी पतली लड़की जो ज्यादा खुबसूरत तो नहीं थी, लेकिन बात करने में एक्सपर्ट सी लग रही थी। वहां पर आई। उससे इंटरव्यू के बारे में बातें की करीब १० मिनिट बाद उसके फोन पर सन्नी का फोन आया। उनके बात करने के करीब ५ मिनिट बाद ही एक लड़का मोटरसाइकिल से हमें लेने वहां पहुंच गया। हम दोनों उसकी बाइक पर बैठकर चल दिए। बाइक चलाने वाला युवक कई रास्तों से होता हुआ टोंक फाटक पुलिया की तरफ लेकर आया। पुलिया पार करके उसने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी और दूर जाकर मोबाइल पर किसी से बात की। थोड़ी देर बाद वहीं पर एक और लड़का आया। मुझे उस लड़के को देखकर अच्छा नहीं लगा तो मैंने साथ वाली लड़की से वापिस लौट चलने के लिए कहा। लड़की ने समझाया कि यहां तक आ ही गए है तो इंटरव्यू देकर चलते है। मैं भी उसके इस तर्क को मान गई। हम दोनों पैदल वाले लड़के के साथ चल दिए। वो लड़का हमें किसी ऑफिस में ले जाने की बजाय किसी घर में ले गया। देखने में ही नजर आ रहा था कि जहां हमें लाया गया है वो किराए पर है। मुझे वहां का माहौल देखकर संदेह हुआ, लेकिन साथ में एक और लड़की होने के कारण डर नहीं लगा। घर में ऊपर की ओर एक कमरा बना था जिसमें तीन लड़के बैठे हुए थे। थोड़ी देर तो वो हमसे नहीं बोले, लेकिन कुछ देर बाद एक ने दूसरे को इशारा किया तो एक लड़का किसी काम की कहकर कमरे से बाहर निकल गया। उसके बाद मेरे साथ वाली लड़की को उसने कुछ इशारा किया। लड़की ने बगैर कुछ किए अंदर बने एक कमरे में चली गई और वहां से तीन ग्लास कोल्ड ड्रिंक बनाकर ले आई। हम तीन लोगों ने कोल्ड ड्रिंक साथ बैठकर ही पी और उसके बाद उस लड़की को इंटरव्यू देने के लिए अंदर ही बने एक और कमरे में भेज दिया। थोड़ी दूर बैठा हुआ सन्नी नाम का युवक मेरे करीब आकर बैठ गया। इस बीच मेरे साथ आने वाली लड़की अंदर वाले कमरे से बाहर आई और कुछ ढूंढकर वापिस कमरे में चली गई, उसने दरवाजा भी बंद कर लिया। मुझे अचानक सिर भारी लगने लगा, ऐसा लगा जैसे धरती हिल रही हो। इस बात की जानकारी मैंने सन्नी को दी। उसने हमदर्दी जताते हुए मुझे अपने हाथों में जकड़ लिया और अपनी तरफ खींचने लगा। उसके बाद जैसे-जैसे दिमाग ज्यादा घूम रहा था सन्नी मेरे कपड़े खोलने लगा। मैं अपने आप को उससे छुटकारा पाने के लिए हाथ पैर चला रही थी, लेकिन नशे में होने के कारण जैसे हिम्मत ही नहीं रही हो। मुझे अहसास हुआ कि मेरे कमर से ऊपर के सभी तरह के कपड़े उतार लिए गए है। मुझे ऐसा लगा कि वो मेरे नीचे के कपड़े भी खोल रहा है तो मैं अपने आपको नियंत्रित करने की कोशिश करने लगी। मुझे होश आता दिख रहा था, इस दौरान मेरे हाथों में कोल्ड ड्रिंक का खाली गिलास आ गया। जिसे मैंने उठाकर जोर से फेंक दिया, ऐसा लगा जैसे वो गिलास दरवाजे से टकराया हो। छीना झपटी करते हुए मेंरे काफी खंरोंचे भी आई। दरवाजे पर जोर की आवाज सुनकर मकान मालकिन ने कमरे का दरवाजा खोलने की आवाज लगाना शुरू कर दिया। जब कुछ देर गेट नहीं खोला मैंरी आवाजें जोर-जोर से आने लगी तो मकान मालकिन और उनकी बहु दरवाजे के बाहर आकर तेजी से हिलाया। ये मुझे याद नहीं की दरवाजा किसने खोला लेकिन मकान मालकिन और उनकी बहु ने मुझे संभाला और कपड़े पहनाए। जब उन्होंने मेरे साथ वाली लड़की के लिए पूछा तो मैंने अंदर वाले कमरे की ओर इशारा कर दिया। वो लड़की और उसके साथ दो लड़के कमरे से बाहर निकले। मैं नशे में होने के कारण कुछ बोल नहीं पा रही थी, मकान मालिक का लड़का नर्सिंग में था उसने मुझे थोड़ी देर सो जाने के लिए कहा। इस दौरान मकान मालकिन और उनकी बहु मेरे साथ थे। हरकत करने वाले लोग वहां से रफूचक्कर हो गए थे। जब नशा कम हो गया तो मकान मालिक और मालकिन दोनों ऑटो में मुझे मेरे घर तक छोडऩे आए। उन्होंने मुझे समझाया और उनके खिलाफ पुलिस में कार्रवाई करने के लिए भी कहा। जो नंबर मेरे पास थे, जो नाम पते उन्होंने बताए थे वे सभी फर्जी निकले। मैं उनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाई। इस हादसे को ना मैं अपने घर पर किसी को बता पाई और ना ही मैं किसी को कहने की हिम्मत जुटा पाई। क्योंकि जितना मैंने सोचा है उस लिहाज से सवालों की बौछार मुझे ही गलत ठहरा रही थी। मैं इतनी परेशान हो गई थी कि मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता था। मानसिक तनवा की इंतहा ही थी कि मैें सोने के लिए नींद की गोलियां खाने लगी थी और सिगरेट भी पीने लगी थी। मैं इतना भयभीत थी कि मैंने सुसाइड करने की कोशिश की। इसके लिए मैंने अपने ही घरवालों से दूरियां बनानी शुरू कर दी। यहां तक की अपने आपको मैंने एक कमरे में समेट लिया था। उस समय मुझे लगा कि क्यूं लोग बेटी के जन्म पर खुशियां नहीं मनाते। यहां तक की कुछ लोग तो बेटी के जन्म होने से पहले ही प्रसव कराने वाली दाई से उसे मारने के लिए कह देते थे। आज भी जब अखबारों में इस तरह की खबर पढ़ती हूं तो सिहर जाती हूं। आखिर मेरा वो गुजरा कल जो मेरी जिंदगी का अंधेरा था मेरे सामने आज भी खड़ा दिखाई देता है। कभी तो मुझे लगता है कि कोई मेरे कॉल्स आज भी टेप कर रहा है। यहां तक की अनजाने नंबरों से मुझे फोन किए जाते है।

Thursday, April 1, 2010

एटीएस के सीक्रेट फंड को लेकर सीेक्रेट वार

आतंकवादियों और देश विरोधी ताकतों तक पहुंचने के लिए खुफिया सूचना तंत्र विकसित करने के लिए राजस्थान एंटी टेरेररिस्ट स्क्वॉड (एटीएस) के लिए बनाया गए सीक्रेट सर्विस फंड (एसएस फंड) को लेकर आजकल एटीएस में जबरदस्त खींचतान मची हुई है। वित्तीय वर्ष 2009-2010 में एसएस फंड के लिए मिले 35 लाख रुपए के खर्चे की यूटलाइजेशन रिपोर्ट 16 मार्च को पुलिस मुख्यालय को भेजी जा चुकी है, जबकि विभाग से भास्कर को छन-छनकर मिल रही खबर के मुताबिक इस मद में अब तक के खर्चे के बाद अभी 24 लाख रुपए बचे हैं, जिसके लिए सभी अधिकारियों से एडवांस में खर्चे के बाउचर भरकर मांगे गए है। जिस तरह से एटीएस की सब छोटी-बड़ी अंदरूनी बातें मीडिया तक पहुंच रहीं हैं, यह इसलिए भी चिंताजनक है कि अगर ऐसे ही खीचतान चलती रही तो आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी।
एसएस फंड के मामले में किसने, कितने के बाउचर भर कर दिए और किसने नहीं भरे यह तो विभाग के अधिकारी जाने, मगर इसको लेकर एटीएस में पुलिस अधिकारी-कर्मचारी दो धड़े में बट गए हैं। एक धड़ा एसएस फंड से इस तरह से खर्च को लेकर पूरी तरह से इसकी मुखालफत करने में जुटा है तो दूसरा किसी तरह से मामला शांत कराने में लगा है।
मुखालफत करने वाले धड़े को लोग कहते हैं कि एसएस फंड का दुरुपयोग न हो इसके लिए आईजी एटीएस को तत्कालीन एडीजी एके जैन ने फंड के तिमाही आडिट के अधिकार दिए थे, जबकि वर्तमान एडीजी कपिल गर्ग ने दिसम्बर महीने में आईजी के एसएस फंड का तिमाही आडिट करने के बाद नया आदेश जारी करके आईजी का आडिट अधिकार छीन लिया। वे कहते हैं कि इससे फंड के दुरुपयोग की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। एसएस फंड का उपयोग आतंकियों के खिलाफ सूचनातंत्र विकसित करने के लिए किया जाना चाहिए, जबकि इसका इस्तेमाल आला अधिकारी फर्नीचर, काफी मशीन, टेलीवीजन, कार की लग्जरी बढ़ाने आदि में कर रहे हैं, इस पर रोक नहीं लगी तो आगे इसका दुरुपयोग और बढ़ेगा।
दूसरा धड़ा कहता है कि एसएस फंड अन आडिटेड फंड है। एटीएस के मुखिया जो भी कर रहे हैं, वे ठीक है। वे कहते हैं कि हो सकता है कि उनके काम करने का तरीका कानून सम्मत न हो लेकिन उनकी नीयत पर हमे कोई शक नहीं है।

किसने सूचना दी, मुझे बताइए

एटीएस एडीजी कपिल गर्ग से सवाल
फंड से खर्चे के मद में आपने एडवांस में वाऊचर भरने के निर्देश दिए है?
देखिए एटीएस में सब कुछ सीक्रेट है। इस बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकता।
हमें आपके विभाग के लोगों ने ही बताया है कि आपने शाखा के सभी अधिकारियों को बुलाकर ऐसे निर्देश दिए है?
मैं कह चुका हूं कि ये सीक्रेट मसले है। आपको जो भी जानकारी दे रहा है वह गलत कर रहा है। आप उसकी जानकारी मुझे दीजिए।

ये जानकारी दे दीजिए कि फंड का कितना रुपया बचा है और कितना खर्च हुआ?
फंड में खर्च करने के बारे में तो सरकार भी नहीं पूछ सकती। एटीएस को सुरक्षा की जिम्मेदारियों को देखते हुए सूचना के अधिकार से परे रखा गया है। आप सूचना देने वाले की जानकारी दें तो बेहतर होगा, क्योंकि ऐसे लोगों की इस शाखा में जरूरत नहीं है। ऐसे व्यक्ति हमारी गोपनीयता कभी भी भंग कर सकते है। जिससे हमारी कार्यप्रणाली बाधित होगी।


मुझसे क्यों उगलवाना चाहते हैं
आईजी डॉ. आलोक त्रिपाठी से सवाल
क्या सभी अधिकारियों को एडीजी ने फंड की धनराशि इस्तेमाल के लिए एडवांस में वाऊचर के निर्देश दिए है?
देखिए फंड की जानकारी देने के लिए एडीजी अधिकृत है। इस बारे में आप उनसे ही बात कीजिए।
लेकिन हम तो आपसे यह जानना चाह रहे है कि आपने भी कोई वाऊचर भरा है क्या?
यह सीके्रट ब्रांच है। यहां की कोई भी, कैसे भी जानकारी नहीं दे सकता।

एटीएस का गठन पर तत्कालीन एडीजी एके जैन ने एसएस फंड का दुरुपयोग रोकने के उद्देश्य से इसके तिमाही आडिट की जिम्मेदारी आईजी एटीएस को करने के अधिकार दिए थे। आपको तो एसएस फंड के आडिट का अधिकार है?
इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता।
मुझे जानकारी मिली है कि आपने 31 दिसम्बर को एसएएस फंड का आडिट किया था?
आप मुझसे जबरदस्ती कबूल करवाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं?
नहीं मेरा ये इरादा नहीं है, अच्छा ये बता दीजिए कि क्या आईजी के आडिट करने के अधिकार खत्म कर दिए गए हैं?
आप तो सब जानते हैं, मुझसे क्यों कहलवाना चाहते हैं?
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सामने लाओ मै भी तो जानू
डिप्टी एसपी दिलीप शर्मा से सवाल
आपने खुद तो खर्चे का एडवांस वाऊचर भरा ही औरों से भी भरवाया है?
नहीं मैंने किसी से जबरन वाऊचर नहीं भरवाए। वैसे भी आजकल कोई किसी की कहां मानता है।
लेकिन इंस्पेक्टर्स का कहना है कि आपने जबरन भरवाए है?
ऐसा कोई कह रहा है तो सामने लाओ, मैं भी तो जानू कि जबरन वाऊचर क्यों भरे है।
चलिए ठीक है ये तो मानते ही हो कि आपने वाऊचर भरा है, क्या ये कानूनी तौर पर गलत नहीं है?
गलत और सही का फैसला करने का अधिकार अधिकारियों को है। इस बारे में आप उनसे ही बात करो।

एएसपी हेमंत शर्मा
आपने कितने के बाउचर भरें है?
मैं इस महकमे में नया आया हू्ं, मैं इस बारे में कुछ नहीं बता सकता। आप उच्चाधिकारियों से पूछे।

Sunday, March 28, 2010

समान कायदा, अधिकारी का बदला नजरिया

केस संख्या - मानसरोवर के आवास संख्या ३१/८२/११ में सार्वजनिक छत पर निर्माण कर कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा था। २७ दिसम्बर, ०७ को नगर निगम कार्यालय में शिकायत की गई। आयुक्त के कहने पर निगम की विजिलेंस शाखा के जिम्मेदार अधिकारी और इलाके के जेईएन ने जांच कर हो रहे निर्माण को अतिक्रमण बताया।
केस संख्या - मानसरोवर के आवास संख्या ३१/८१/१२ में सार्वजनिक छत पर निर्र्माण की शिकायत आई तो टालने के लिए नगर निगम के जिम्मेदारों ने क्षेत्राधिकार आवासन मंडल का बताते हुए शिकायत वहां भेज दी। मंडल के उपआवासन आयुक्त ने मामले की जांच करवाकर निर्माण को अतिक्रमण मानते हुए नगर निगम को तोडऩे की जिम्मेदारी सौंप दी। निगम अधिकारियों ने मिलीभगत कर अतिक्रमण को अवैध निर्माण बताकर छत पर कब्जा करने वालों को बचा लिया।
कायदा समान, अधिकारियों की आंखों में फर्ख
सरकारी जमीन पर कब्जा करने को अतिक्रमण कहा जाता है, जबकि बगैर स्वीकृति के खुद की जमीन पर निर्माण करने को अवैध निर्माण। शहर के स्वरूप को बिगाडऩे वाले इन कारनामों को सरकार ने कानूनी तौर पर गलत माना है, लेकिन अफसरों की मिलीभगत से शहर में दोनों ही तरीके के काम धड़ल्ले से हो रहे है। शहर के बिगड़ रहे हालातों को देख सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से इस मामले में शपथ पत्र भी मांगा है।
केस स्टडी के दोनों मामलों पर नजर डाले तो दोनों एक जैसे ही मामले है लेकिन जिम्मेदार लोगों ने इसमें फर्ख पैदाकर अपनी बदनीयति उजागर कर दी। आवासन मंडल की मानसरोवर योजना में छत को सरकारी माना है। छत पर निर्माण करने को अतिक्रमण मान कर कार्रवाई की जाती है, लेकिन जहां अधिकारियों की निर्माण करने वालों से सैटिंग बैठ जाती है वहीं उस निर्माण को अवैध निर्माण कहकर अपराध को हल्का कर दिया जाता है। ...क्योंकि अवैध निर्माण को तो कंपाऊंड किया जा सकता है, लेकिन अतिक्रमण के मामले में तीन माह से तीन साल तक की कैद या 20 से 50 हजार रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। ऐसे में जिम्मेदार अधिकारी लोगों से मिलकर सरकारी छतों को खा रहे है।
पहले केस में जहां नगर निगम द्वारा राजस्थान नगर पालिका अधिनियम १९५९ की धारा २०३ के तहत अतिक्रमी को नोटिस दिया गया था जबकि नए कानून में समान मामलों में कार्रवाई के लिए राजस्थान नगर पालिका अधिनियम २००९ की धारा २४५ के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए थी। जिसमें अतिक्रमण करने के मामले तीन साल की सजा और २० हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। जिसे नगर निगम कम्पाउंड भी नहीं कर सकती है। परंतु अतिक्रमण और अतिक्रमी को बचाने के लिए उद्देश्य से गलत नोटिस दिया गया। इस तरह के कारनामों से जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही तो दिखाई दे रही है जबकि राजस्थान उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने शहर में हो रहे अतिक्रमण और अवैध निर्माणों के विरूद्ध स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लेकर २० अक्टूबर २००४ को निर्णय सुनाया गया था, जिसकी भी सीधे तौर पर अवमानना है।
बचाने का रास्ता पार्टी ने असर नहीं लिया
नगर निगम की ओर से अतिक्रमण और अवैध निर्माण की शिकायत पर भेजे जाने वाले नोटिस में निर्धारित समय के बाद भी कार्रवाई करने की बजाय लीपापोती करते है। इसका उदाहरण है ज्यादातर नोटिसों के जवाब में निगम अधिकारियों ने पार्टी द्वारा नोटिस का असर नहीं लेने जैसे जुमले प्रयोग कर खानापूर्ति की जा रही है। जबकि जवाब नहीं आने पर निगम अतिक्रण को स्वयं हटाने उस पर होने वाले खर्चे का अधिकारी है।
फाइल की कहानी भी अजीब
सरकारी छत पर हो रहे निर्माण शिकायत की एक फाइल डीबी स्टार को मिली। फाइल को देखा तो उसकी कहानी भी अजीब है। तत्कालीन महापौर पंकज जोशी ने सरकारी छत पर किए गए अनाधिकृत निर्माण के विरूद्ध तत्काल कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए तत्कालीन विजिलिेंस कमिश्नर संग्रामसिंह को लिखा। संग्रामसिंह ने यह कहते हुए अपना बचाव किया कि मानसरोवर जोन आयुक्त ही इस पर कार्रवाई कर सकते है। मानसरोवर जोन आयुक्त ने ९ नवम्बर, ०९ में अतिक्रमण को अवैध निर्माण बताकर नोटिस जारी कर दिया और तीन दिन में हटाने का अल्टीमेटम दिया। उसके बाद २१ नवंबर को नोटिस का सायल द्वारा असर नहीं लिया गया लिखकर चालान पेश कर दिया।
मानसरोवर जोन आयुक्त ओपी गुप्ता से सवाल
मानसरोवर योजना की छत नगर निगम की नजर में क्या है। अवैध निर्माण या अतिक्रमण?
सरकार की नजर में छत तो सरकारी है, जबकि आवासी इसे अपनी बताते है।
आपके जोन में सेम नेचर के मामले में अलग-अलग पैमाना क्यों है?
इसकी मुझे जानकारी नहीं है। मैं तो अभी जनवरी में ही यहां आया हूं। जानकारी करने के बाद ही कुछ कह पाऊंगा।
लेकिन अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई तो होती ही नहीं?
नहीं ऐसा नहीं है। शिकायत आने के बाद कार्रवाई जरूर होती है।
लेकिन दोनों ही मामलों में आज तक कोई तुड़ाई नहीं हुई?
इसकी फाइल देखकर ही कुछ कह सकता हूं

Monday, March 22, 2010

अब इस नृत्यांगना की बारी!

दो साल में अब तक रामबाग चौराहे पर दो दफा हो चुकी है चोरी
रामबाग सर्किल पर लगी तीज सवारी के स्कल्पचर्स में से दो दफा चोरी होने के बाद एक बार फिर एक और कलाकृति कभी भी चोरी हो सकती है। स्कल्पचर्स में सबसे आगे लगी नर्तकी की कलाकृति कभी भी चोरी हो सकती है। नर्तकी की कलाकृर्ति को खड़ा रखने के लिए लोहे के एंगल का आधार पूरी तरह से तोड़ दिया गया है। हालात यह है कि वर्तमान में मूर्ति केवल कुछ पत्थरों के सहारे टिकी हुई है ऐसे में चोर कब आकर इसे ले जाएंगे कोई जानने वाला नहीं है। सुरक्षा के नाम पर तैनात गाडर््स को भी सोने से फुर्सत नहीं है वहीं जेडीए उनके भरोसे बैठा चैन की नींद सो रहा है।
शहर के सौंदर्यन को लेकर रामबाग चौराहा, बजाज नगर और टोंक रोड पर विभिन्न मुद्राओं में कलाकृति लगवाई गई थी। अष्टधातु की बनी इन महंगी मूर्तियों के चोरी होने का सिलसिला शुरू से ही चल रहा है। रामबाग से सवार्धिक दो मूर्तियां चोरी हो चुकी है। इसके बावजूद जयपुर विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने सुरक्षा को लेकर कोई खास इंतजाम नहीं किए। डीबी स्टार को एक जागरूक नागरिक ने रामबाग चौराहे पर लगी एक कलाकृति चोरी होने का अंदेशा इस बात को लेकर जताया कि नर्तकी की कलाकृति केवल पत्थरों के सहारे टिकी हुई है, जबकि अन्य कलाकृति लोहे के एंगल से जुड़ी हुई है डीबी स्टार टीम ने माका देखा तो नजर आया कि स्कल्पचर्स सभी लोहे के एंगलों से जुड़े हुए है। सबसे आगे लगी नर्तकी की कलाकृति पत्थरों के सहारे खड़ी है। उसे थोड़ा सा हिलाया तो वह नीचे गिरने लगी। ऐसे में कलाकृति के चोरी करने के तरीके का आभास जरूर हो गया।
जानकारों ने बताया कि चोर लोहे के एंगल को धीरे-धीरे तोड़ते है और मूति को पत्थरों के सहारे खड़ा कर देते है। जब किसी को कोई संदेह नहीं होता तब मौका देख कलाकृति को उठा ले जाते है। चोर कलाकृतियों के उठा ले जाने का समय भी ऐसा रखते है कि भीड़ भी कम हो और सुरक्षा गार्ड को भी झपकी आती रहे। जब गार्ड की नींद खुलती हँै तो कलाकृति गायब नजर आती है।
जानकारी में सामने आया कि करीब अप्रैल, ०८ में लगी तीज की सवारी थीम बेस्ड कलाकृतियों में चोरों ने दो दफा हाथ आजमाए है। एक बार तो २४ जून, ०८ को चार कलाकृति व दूसरी बार ३१ दिसम्बर, ०८ को दो कलाकृति चोरी हो चुकी है। सुरक्षा एजेंसियों ने दोनो ही बार ज्योतिनगर थाने में चोरी का मामला दर्ज कराया।
मुकदमें में लगी एफआर
कलाकृति चोरी होने के दर्ज कुछ हाथ नहीं लगने के बाद सब इंस्पेक्टर एकता मीणा ने मामले में एफआर दे दी। मामले की जांच कर रही मीणा ने बताया कि जब मुल्जिम पकड़े जाएंगे तब केस खोलकर आगे की कार्रवाई को अंजाम दे दिया जाएगा।
और भी जगह यही हाल
बजाज नगर तिराहे पर लगी दो कलाकृतियां चोरी हो चुकी है। जबकि टोंक रोड आश्रम मार्ग पर दो दफा चोरी का प्रयास किया गया। एक प्रयास को तो करीब एक माह का समय ही हुआ है जब चोर कलाकृतियों को हिलाकर एंगल तोड़ रहे थे, तैनात गार्ड ने हल्ला मचा दिया।
जांच अधिकारी एकता मीणा से सवाल
रामबाग से कलाकृति चोरी के मामले में जांच कहां तक पहुंची?
उस मामले में तो कभी की एफआर लग चुकी है।
इतनी जल्दी एफआर देने का कारण?
जल्दी कहां, दो तीन महीने तलाश और जांच के बाद मामले में एफआर दी है। जांच में जब कुछ नहीं निकला तो कब तक उसे लेकर बैठे रहते ।
इसका मतलब जांच खत्म?
नहीं जब भी मुकदमे से संबंधित कुछ हाथ लगेगा तभी केस रिओपन हो जाएगा।
जांच किस आधार पर हुई?
मामला चोरी से जुड़ा है। जांच के लिए मूर्तिचोरों से पूछताछ की गई। कुछ जगहों पर मूर्तियां मिली, लेकिन वे चोर इस तरह की नहीं मंदिरों की मूर्तियां चुराते थे। इस कारण मामले में ज्यादा कुछ नहीं हाथ लगा।
जेडीए के एडिशनल चीफ इंजीनियर ललित शर्मा से सवाल
स्कल्पचर्स की सुरक्षा को लेकर क्या इंतजाम है?
२४ घंटें के लिए सुरक्षा गार्ड तैनात किए हुए है।
लेकिन वे तो सोते रहते है?
हमें क्या फर्ख पड़ता है। पहले की चोरी हुई कलाकृति की रिकवरी हमने सुरक्षा एजेंसी से की है।
तो क्या रिकवरी ही करते रहेंगे?
नहीं सुरक्षा को लेकर मार्च की रिव्यू बैठक में विचार किया गया थ। इसमें एसई को कलाकृतियों की सुरक्षा को लेकर प्रोजेक्ट बनाने को कहा गया है।
किस तरह का होगा प्रोजेक्ट?
ऐसा डिवाइस तैयार करने के लिए कहा गया है जिससे कलाकृतियों के हाथ लगाते ही अलार्म बज उठे। वैसे और भी संभावनाएं तलाशी जा रही है।